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उ॒शन्ता॑ दू॒ता न दभा॑य गो॒पा मा॒सश्च॑ पा॒थः श॒रद॑श्च पू॒र्वीः । इन्द्र॑वायू सुष्टु॒तिर्वा॑मिया॒ना मा॑र्डी॒कमी॑ट्टे सुवि॒तं च॒ नव्य॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uśantā dūtā na dabhāya gopā māsaś ca pāthaḥ śaradaś ca pūrvīḥ | indravāyū suṣṭutir vām iyānā mārḍīkam īṭṭe suvitaṁ ca navyam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उशन्ता॑ । दू॒ता । न । दभा॑य । गो॒पा । मा॒सः । च॒ । पा॒थः । श॒रदः॑ । च॒ । पू॒र्वीः । इन्द्र॑वायू॒ इति॑ । सु॒ऽस्तु॒तिः । वा॒म् । इ॒या॒ना । मा॒र्डी॒कम् । ई॒ट्टे॒ । सु॒वि॒तम् । च॒ । नव्य॑म् ॥ ७.९१.२

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:91» मन्त्र:2 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:13» मन्त्र:2 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:2


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रवायू) हे कर्मयोग और ज्ञानयोगसम्पन्न विद्वानों ! (उशन्ता) आप हमारे कल्याण की इच्छा करते हुए (दूता) शुभ मार्ग दिखलानेवाले दर्शक के (न) समान (दभाय) हमारे कल्याण के लिये (गोपाः) आप हमारे रक्षक बनें (शरदश्च, पूर्वीः) और अनन्त काल तक (पाथः) हमारे शुभ मार्ग की ओर (मासश्च) शुभ समयों की आप रक्षा करें, (सुस्तुतिः) हमारी स्तुति (वाम्) आप लोगों को (इयाना) प्राप्त होती हुई (मार्डीकम्) सुख की (ईट्टे) याचना करती है (च) और (नव्यं) नवीन (सुवितं) धन की याचना करती है ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो लोग कर्मयोगी और ज्ञानयोगी विद्वानों को अपना नेता बनाते हैं, वे सुख को प्राप्त होते हैं और उनको नवीन से नवीन धनादि वस्तुओं की सदैव प्राप्ति होती है ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

राजा व सेनापति का कर्त्तव्य

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- (उशन्ता) = सबको चाहनेवाले (दूता) = शत्रु सन्तापक, (गोपा) = प्रजा- रक्षक, (इन्द्रवायू) = ऐश्वर्यवान्, बलवान् पुरुष (मासः च शरदः च) = वर्षों और मासों तक (पूर्वी:) = पूर्व विद्यमान प्रजा की (पाथः) = रक्षा करें। हे (इन्द्र-वायू) = ऐश्वर्यवन्! हे बलवन् ! (वाम् इयाना) = आप दोनों को प्राप्त होता हुआ, (सुस्तुतिः) = उत्तम उपदेश (मार्डीकम्) = सुख और (सुवितं) = उत्तम, (नव्यम्) = स्तुत्य आचार (ईट्टे) = चाहता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राजा और सेनापति दोनों प्रजा की अच्छी प्रकार से रक्षा करें तथा शत्रु को नष्ट करें। इससे राष्ट्र में विद्वान् लोग ज्ञान का उपदेश देकर प्रजाओं को धर्म कार्य में लगा सकेंगे।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रवायू) हे कर्मज्ञानयोगसम्पन्ना विद्वांसः ! (उशन्ता) अस्मत्कल्याणं वाञ्छन्तः (दूता) शुभमार्गस्य दर्शितारः (न) इव (दभाय) अस्मत्कल्याणाय (गोपाः) नो रक्षका भवन्तो भवन्तु (शरदश्च पूर्वीः) बहूनि वर्षाणि यावत् (पाथः) अस्मत्सन्मार्गं (मासश्च) शुभसमयं च रक्षन्तु (सुस्तुभिः) अस्मत्कृता शोभनस्तुतिः (वाम्) युष्मान् (इयाना) प्राप्नुवती सती (मार्डीकम्) सुखं (ईट्टे) प्रार्थयते (च) तथा च (नव्यम्) नूतनं (सुवितम्) सुष्ठु प्राप्यं धनं च याचते ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra and Vayu, leaders of power and vibrancy of passion motivated like prophets, you are not for oppression but for the defeat of oppression. You are protectors of humanity and pioneers over paths of progress for many many months, seasons and years. O harbingers of power and progress, our song of adoration addressed to you seeks compassion and prays for a new rise in wealth and well being.