वांछित मन्त्र चुनें
417 बार पढ़ा गया

ई॒ळेन्यो॑ वो॒ मनु॑षो यु॒गेषु॑ समन॒गा अ॑शुचज्जा॒तवे॑दाः। सु॒सं॒दृशा॑ भा॒नुना॒ यो वि॒भाति॒ प्रति॒ गावः॑ समिधा॒नं बु॑धन्त ॥४॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

īḻenyo vo manuṣo yugeṣu samanagā aśucaj jātavedāḥ | susaṁdṛśā bhānunā yo vibhāti prati gāvaḥ samidhānam budhanta ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ई॒ळेन्यः॑। वः॒। मनु॑षः। यु॒गेषु॑। स॒म॒न॒ऽगाः। अ॒शु॒च॒त्। जा॒तऽवे॑दाः। सु॒ऽस॒न्दृशा॑। भा॒नुना॑। यः। वि॒ऽभाति॑। प्रति॑। गावः॑। स॒म्ऽइ॒धा॒नम्। बु॒ध॒न्त॒ ॥४॥

417 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:9» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:2» वर्ग:12» मन्त्र:4 | मण्डल:7» अनुवाक:1» मन्त्र:4


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर कौन प्रशंसा योग्य होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (यः) जो (ईळेन्यः) स्तुति के योग्य (समनगाः) संग्राम को प्राप्त होनेवाला (जातवेदाः) विद्या को प्राप्त हुआ (युगेषु) बहुत वर्षों में (वः) तुम (मनुषः) मनुष्यों को (सुसन्दृशा) अच्छे प्रकार दिखानेवाले (भानुना) किरण से सूर्य के समान (विभाति) प्रकाशित करता है और जैसे (समिधानम्) देदीप्यमान के (प्रति) प्रति (गावः) किरण (बुधन्त) बोध के हेतु होते हैं, वैसे (अशुचत्) शुद्ध प्रतीति कराता है, वही मनुष्यों में उत्तम होता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य्य के सदृश शुभ गुणों का ग्रहण कराके मनुष्यों को प्रकाशित करते हैं, वे प्रशंसा करने योग्य होते हैं ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'दम्पतियों से मिलकर उपास्य' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वः) = हमारे (मनुषः युगेषु) = मानव जोड़ों में, दम्पतियों में, पति-पत्नी में (ईडेन्यः) = वह प्रभु स्तुत्य हैं। पति-पत्नी को मिलकर प्रातः प्रभु स्मरण अवश्य करना ही चाहिये। ये पति-पत्नी आदर्शगृह का निर्माण कर पाते हैं। यह (जातवेदा:) = सर्वज्ञ प्रभु (समनगाः) = संग्राम में संगत होता है। अर्थात् हम काम-क्रोध आदि से संग्राम करते हैं। तो ये प्रभु हमारे सहायक होते हैं। (अशुधत्) = हृदयदेश में दीप्त होते हैं। [२] (सुसन्दृशा) = उत्तम दर्शनीय (भानुना) = दीप्ति से (यः विभाति) = जो प्रभु विशिष्ट दीप्तिवाले हैं, उस (समिधानम्) = सम्यक् देदीप्यमान प्रभु को (गाव:) = सब वेदवाणियाँ प्रतिबुधन्त ज्ञापित करती हैं, ये सब वाणियाँ प्रभु का ही ज्ञान देती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दम्पती मिलकर प्रातः प्रभुस्तवन करें। काम-क्रोध आदि से संग्राम में ये प्रभु ही हमारे सहायक होते हैं। सब वेद-वाणियाँ इस प्रकाशमय प्रभु का प्रतिपादन करती हैं।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः कः प्रशंसनीयो भवतीत्याह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! य ईळेन्यस्समनगा जातवेदा युगेषु वो मनुषः सुसंदृशा भानुना सूर्य इव विभाति यथा समिधानं प्रति गावो बुधन्त तथाऽशुचत् स एव नरोत्तमो भवति ॥४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ईळेन्यः) स्तोतुमर्हः (वः) युष्मान् (मनुषः) मननशीलान् (युगेषु) बहुषु वर्षेषु (समनगाः) यः समनं सङ्ग्रामं गच्छति सः (अशुचत्) शोधयति (जातवेदाः) जातविद्यः (सुसंदृशा) सुष्ठु सम्यग् दर्शकेन (भानुना) किरणेन (यः) (विभाति) (प्रति) (गावः) किरणाः (समिधानम्) देदीप्यमानम् (बुधन्त) बोधयन्ति ॥४॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये मनुष्याः सूर्यवच्छुभान् गुणान् ग्राहयित्वा मनुष्यान् प्रकाशयन्ति ते प्रशंसितुं योग्या जायन्ते ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The adorable one going on through the battles of existence for ages, the one omniscient and omnipresent with all that is born in the world, who purifies, sanctifies and enlightens you all humans with the blissful light of life and knowledge, and the refulgent one to whom the earths, planets, satellites, and the rays of light respond with brilliance, that is Agni, that is the sun, that is the Enlightened One.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जी माणसे सूर्याप्रमाणे शुभगुणांचे ग्रहण करून माणसांना प्रकाशित करतात ती प्रशंसा करण्यायोग्य असतात. ॥ ४ ॥