इ॒न्धे राजा॒ सम॒र्यो नमो॑भि॒र्यस्य॒ प्रती॑क॒माहु॑तं घृ॒तेन॑। नरो॑ ह॒व्येभि॑रीळते स॒बाध॒ आग्निरग्र॑ उ॒षसा॑मशोचि ॥१॥
indhe rājā sam aryo namobhir yasya pratīkam āhutaṁ ghṛtena | naro havyebhir īḻate sabādha āgnir agra uṣasām aśoci ||
इ॒न्धे। राजा॑। सम्। अ॒र्यः। नमः॑ऽभिः। यस्य॑। प्रती॑कम्। आऽहु॑तम्। घृ॒तेन॑। नरः॑। ह॒व्येभिः॑। ई॒ळ॒ते॒। स॒ऽबाधः॑। आ। अ॒ग्निः। अग्रे॑। उ॒षसा॑म्। अ॒शो॒चि॒ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब वह राजा कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु नमन व हवन
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ स राजा कीदृशः स्यादित्याह ॥
ये नरो हव्येभिर्नमोभिस्सह घृतेन यस्याहुतं प्रतीकमीळते स समर्यो राजाऽहं तानिन्धे। यथोषसामग्रे सबाधोऽग्निराशोचि तथाऽहं शत्रूणां सम्मुखे स्वसेनाप्रकाशक उत्साहकश्च भवेयम् ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नीच्या दृष्टांताने राजाच्या कर्तव्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
