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अधा॑ ह॒ यन्तो॑ अ॒श्विना॒ पृक्ष॑: सचन्त सू॒रय॑: । ता यं॑सतो म॒घव॑द्भ्यो ध्रु॒वं यश॑श्छ॒र्दिर॒स्मभ्यं॒ नास॑त्या ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

adhā ha yanto aśvinā pṛkṣaḥ sacanta sūrayaḥ | tā yaṁsato maghavadbhyo dhruvaṁ yaśaś chardir asmabhyaṁ nāsatyā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अध॑ । ह॒ । यन्तः॑ । अ॒श्विना॑ । पृक्षः॑ । स॒च॒न्त॒ । सू॒रयः॑ । ता । यं॒स॒तः॒ । म॒घव॑त्ऽभ्यः । ध्रु॒वम् । यशः॑ । छ॒र्दिः । अ॒स्मभ्य॑म् । नास॑त्या ॥ ७.७४.५

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:74» मन्त्र:5 | अष्टक:5» अध्याय:5» वर्ग:21» मन्त्र:5 | मण्डल:7» अनुवाक:5» मन्त्र:5


आर्यमुनि

अब विद्वानों से यश और ऐश्वर्य्य ग्रहण करने का उपदेश कथन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (नासत्या) हे सत्यवादी विद्वानों ! आप (अस्मभ्यं) हम लोगों को (यशः छर्दिः) यश उत्पन्न करनेवाले स्थान दें (मघवद्भ्यः) हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न विद्वानों ! हमें आपकी कृपा से (पृक्षः यंसतः) अन्नादि ऐश्वर्य्य प्राप्त हों और (ता) आप हमें (ध्रुवं) दृढ़ता प्रदान करें, ताकि हम (सूरयः) शूरवीर बनकर (सचन्त) आप लोगों की सेवा में तत्पर रहें। (अश्विना) हे अध्यापक तथा उपदेशको ! आप (अधा ह यन्तः) हमको प्राप्त होकर सदुपदेश करें। ‘ह’ यहाँ प्रसिद्धार्थ का वाचक है ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे यश तथा ऐश्वर्य्य की कामनावाले यजमानो ! तुम विद्वान् उपदेशकों को प्राप्त होकर उनसे सदुपदेश ग्रहण करते हुए यशस्वी और ऐश्वर्य्यशाली होओ और अपने व्रत में दृढ़ रहो अर्थात् ऐश्वर्य्यसम्पन्न होने पर भी अपने व्रत से कदापि विचलित न हो ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

परिव्राजक का सत्कार

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ हे (अश्विना) = स्त्री-पुरुष तथा विद्वान् और सामान्य जनो! (अध ह) = निश्चय से (यन्तः सूरयः) = आगे बढ़ते हुए, विद्वान्, परिव्राजक जन (पृक्षः सचन्त) = सर्वत्र अन्न और स्नेह- सम्पर्क प्राप्त करते हैं। हे (नासत्या) = कभी असत्य व्यवहार न करनेवाले जनो! (ता) = वे आप दोनों (अस्मभ्यम् मघवद्भयः) = हम ज्ञानवाले पुरुषों को (ध्रुवं स्थिर यशः) = यश और अन्न (छर्दिः) = आवास के लिये घर( यंसतः) = प्रदान करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ विद्वान् तथा सामान्य गृहस्थी जन अपने द्वार पर आए हुए परिव्राजक जनों अर्थात् विद्वान् तपस्वी अतिथियों का भोजन तथा निवास की व्यवस्था आदि से सत्कार करें। उनसे शंका- समाधान व ज्ञान प्राप्त कर यश के भागी बनें।x

आर्यमुनि

अथ विद्वद्भ्यो यशोग्रहणम् ऐश्वर्यं चोपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (नासत्या) हे सत्यवादिविद्वांसः ! यूयम् (अस्मभ्यम्) अस्मदर्थम् (यशश्छर्दिः) उन्नतिप्रदं गृहं दत्त अन्यच्च (मघवद्भ्यः) अन्नवद्भ्यो विद्वद्भ्यः (पृक्षः, यंसतः) अन्नाद्यैश्वर्यं प्राप्यतां (ता) भवन्तः (ध्रुवम्) दार्ढ्यं प्रयच्छन्तु यतो वयं (सूरयः) शूरवीरतां सम्पाद्य (सचन्त) सङ्गता भवेम (अधा ह यन्तः) अथ च अस्मभ्यं सत्योपदेशं प्रददतु ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And now, Ashvins, leading lights of the truth and law of nature and humanity, brilliant sages and scholars are on the move and come to join you in pursuit of knowledge. To them, grant honour and fame with the wealth of achievement, and bless us with a happy and peaceful home.