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इ॒मा उ॑ वां॒ दिवि॑ष्टय उ॒स्रा ह॑वन्ते अश्विना । अ॒यं वा॑म॒ह्वेऽव॑से शचीवसू॒ विशं॑विशं॒ हि गच्छ॑थः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

imā u vāṁ diviṣṭaya usrā havante aśvinā | ayaṁ vām ahve vase śacīvasū viśaṁ-viśaṁ hi gacchathaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒माः । ऊँ॒ इति॑ । वा॒म् । दिवि॑ष्टयः । उ॒स्रा । ह॒व॒न्ते॒ । अ॒श्वि॒ना॒ । अ॒यम् । वा॒म् । अ॒ह्वे । अव॑से । श॒ची॒व॒सू॒ इति॑ शचीऽवसू॒ । विश॑म्ऽविशम् । हि । गच्छ॑थः ॥ ७.७४.१

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:74» मन्त्र:1 | अष्टक:5» अध्याय:5» वर्ग:21» मन्त्र:1 | मण्डल:7» अनुवाक:5» मन्त्र:1


आर्यमुनि

अब परमात्मा विद्युत् तथा अग्निविद्यावेत्ता उपदेशकों का सर्वत्र प्रचार करना कथन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (शचीवसू) विद्युत् तथा अग्निविद्या में कुशल (अश्विना) अध्यापक तथा उपदेशको ! (दिविष्टयः) स्वर्ग की कामना करनेवाले (उस्रा) यजमान (वां) तुम्हारा (हवन्ते) आह्वान करते हैं, तुम (इमाः) इस विद्या का (वां) उनको उपदेश करो (उ) और (हि) निश्चय करके (गच्छथः) गमन करते हुए (विशंविशं) प्रत्येक प्रजा को विद्वान् बनाओ, जिससे (अयं) ये (अवसे) अपनी रक्षा करें और (अह्वे) तुम्हारा आह्वान करते रहें ॥१॥
भावार्थभाषाः - हे विद्वानों ! तुम सुख की इच्छावाले यजमानों को प्राप्त होकर उनको विद्युत् तथा अग्निविद्या का उपदेश करो, जिससे वे कला-कौशल बनाने में प्रवीण हों और प्रत्येक स्थान में घूम-घूम कर प्रजाजनों को इस विद्या का उपदेश करो, जिससे वे कलायन्त्र बनाकर ऐश्वर्य्यशाली हों या यों कहो कि प्रजाजनों में विज्ञान और ऐश्वर्य्य का उपदेश करो, जिससे उनके शुभ मनोरथ पूर्ण हों ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सभापति के कर्त्तव्य

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- हे (अश्विना) = अश्व अर्थात् राष्ट्र और अश्वादिसैन्य के स्वामी, सेनापति सभापति जनो! आप दोनों (उस्त्रा) = उत्तम पदार्थों को देने एवं गृह और राष्ट्र में स्वयं बसने और अन्यों को बसानेवाले, तेजस्वी (वां) = आप दोनों को (इमा दिविष्टयः) = ये उत्तम ज्ञान और कान्ति चाहनेवाली प्रजाएँ (हवन्ते) = बुलाती हैं और (अयं) = यह विद्वान् वर्ग भी, हे (शचीवसू) = शक्ति और वाणी के धनी युगलो ! (वां) = आप दोनों को (अवसे) = रक्षा और ज्ञान के लिये (अह्वे) = पुकारता है, आप दोनों (विशं विशं हि) = प्रत्येक प्रजावर्ग में (गच्छथः) = जाया करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सेनापति तथा सभापति दोनों का कर्त्तव्य है कि वे प्रजाजनों को उनके रहने के और रक्षा तथा ज्ञान के साधन व सुविधाएँ उपलब्ध लिए राष्ट्र में सुविधा सम्पन्न बस्तियाँ बसावें करावें ।

आर्यमुनि

अथ परमात्मा विद्युदग्निविद्याविदामुपदेशकानां प्रचारमुपदिशति।

पदार्थान्वयभाषाः - (शचीवसू) विद्युदग्निविद्याविदः (अश्विना) अध्यापकोपदेशकौ ! (दिविष्टयः) स्वर्गकामाः (उस्रा) यजमाना (वाम्) युष्मान् (हवन्ते) आह्वयन्ते, अतो यूयं (इमाः) इमा विद्याः (वाम्) तान् उपदिशत (उ) अथ च (हि) निश्चयेन (गच्छथः) पर्य्यटन्तः (विशंविशम्) प्रतिमनुष्यं विद्वांसं कुरुत येन (अयम्) एते (अवसे) आत्मानं रक्षन्तु (अह्वे) युष्मान् आह्वयन्तु च ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Brilliant Ashvins, these yajakas dedicated to life divine invoke and call upon you for light, and I too, O versatile commanders of the wealth of knowledge, power and vision, invite you and pray for protection and advancement since you visit and bless every individual and every community.