यं त्राय॑ध्व इ॒दमि॑दं॒ देवा॑सो॒ यं च॒ नय॑थ। तस्मा॑ अग्ने॒ वरु॑ण॒ मित्रार्य॑म॒न्मरु॑तः॒ शर्म॑ यच्छत ॥१॥
yaṁ trāyadhva idam-idaṁ devāso yaṁ ca nayatha | tasmā agne varuṇa mitrāryaman marutaḥ śarma yacchata ||
यम्। त्राय॑ध्वे। इ॒दम्ऽइ॑दम्। देवा॑सः। यम्। च॒। नय॑थ। तस्मै॑। अ॒ग्ने॒। वरु॑ण। मित्र॑। अर्य॑मन्। मरु॑तः। शर्म॑। य॒च्छ॒त॒ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब बारह ऋचावाले उनसठवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सन्मार्ग पर चलो
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्विद्वद्भिः किं कर्तव्यमित्याह ॥
हे मरुतो देवासो ! यूयमिदमिदं यन्नयथ यं च त्रायध्ये तस्मै शर्म यच्छत, हे अग्ने वरुण मित्रार्यमँस्त्वमेतानेव सदा सेवस्व ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात वायूच्या दृष्टान्ताने विद्वान व ईश्वराच्या गुण व कृत्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
