ओ श्रु॒ष्टिर्वि॑द॒थ्या॒३॒॑ समे॑तु॒ प्रति॒ स्तोमं॑ दधीमहि तु॒राणा॑म्। यद॒द्य दे॒वः स॑वि॒ता सु॒वाति॒ स्यामा॑स्य र॒त्निनो॑ विभा॒गे ॥१॥
o śruṣṭir vidathyā sam etu prati stomaṁ dadhīmahi turāṇām | yad adya devaḥ savitā suvāti syāmāsya ratnino vibhāge ||
ओ इति॑। श्रु॒ष्टिः। वि॒द॒थ्या॑। सम्। ए॒तु॒। प्रति॑। स्तोम॑म्। द॒धी॒म॒हि॒। तु॒राणा॑म्। यत्। अ॒द्य। दे॒वः। स॒वि॒ता। सु॒वाति॑। स्याम॑। अ॒स्य॒। र॒त्निनः॑। वि॒ऽभा॒गे ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब सात ऋचावाले चालीसवें सूक्त का प्रारम्भ किया जाता है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
धन सम्पन्न बनो
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्मनुष्याः किं कुर्युरित्याह ॥
ओ विद्वन् ! यथा श्रुष्टिर्विदथ्या तुराणां प्रतिस्तोमं समेतु तथैतं स्तोमं वयं दधीमहि यदद्य देवस्सविता विभागेऽस्य रत्निनः स्तोमं सुवाति तथा वयं स्याम ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात विश्वेदेवांच्या गुण कर्माचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताबरोबर पूर्वसूक्तार्थाची संगती जाणावी.
