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यू॒यं ह॒ रत्नं॑ म॒घव॑त्सु धत्थ स्व॒र्दृश॑ ऋभुक्षणो॒ अमृ॑क्तम्। सं य॒ज्ञेषु॑ स्वधावन्तः पिबध्वं॒ वि नो॒ राधां॑सि म॒तिभि॑र्दयध्वम् ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yūyaṁ ha ratnam maghavatsu dhattha svardṛśa ṛbhukṣaṇo amṛktam | saṁ yajñeṣu svadhāvantaḥ pibadhvaṁ vi no rādhāṁsi matibhir dayadhvam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यू॒यम्। ह॒। रत्न॑म्। म॒घव॑त्ऽसु। ध॒त्थ॒। स्वः॒ऽदृशः॑। ऋ॒भु॒क्ष॒णः॒। अमृ॑क्तम्। सम्। य॒ज्ञेषु॑। स्व॒धा॒ऽव॒न्तः॒। पि॒ब॒ध्व॒म्। वि। नः॒। राधां॑सि। म॒तिऽभिः॑। द॒य॒ध्व॒म् ॥२॥

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:37» मन्त्र:2 | अष्टक:5» अध्याय:4» वर्ग:3» मन्त्र:2 | मण्डल:7» अनुवाक:3» मन्त्र:2


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (स्वधावन्तः) बहुत अन्नादि पदार्थयुक्त (स्वर्दृशः) सुख देखते हुए (ऋभुक्षणः) मेधावी विद्वान् जनो ! (यूयम्, ह) तुम्हीं (मतिभिः) बुद्धियों से (मघवत्सु) बहुत धनयुक्त व्यवहारों में (रत्नम्) रमणीय धन को (सम्, धत्थ) अच्छे प्रकार धारण करो (यज्ञेषु) सङ्ग करने योग्य व्यवहार में (अमृक्तम्) विनाश को नहीं प्राप्त ऐसे बड़ी ओषधियों के रस को (पिबध्वम्) पीओ और (नः) हमारे (राधांसि) धनों को (वि, दयध्वम्) विशेष दया से चाहो ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो विद्वान् जन हैं, वे प्रजाओं में ब्रह्मचर्य्य विद्या उत्तम क्रिया बड़ी-बड़ी ओषधियों और धनों को बढ़वाकर सुखी हों ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उत्तम विद्या का दान

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- हे (स्वर्दृशः) = आनन्द का (साक्षात्) = करनेवाले (ऋभुक्षणः) = सत्य- प्रकाश से चमकनेवाले ! (यूयं) = आप (मघवत्सु) = ऐश्वर्यवान् पुरुषों में (अमृक्तं) = अविनाशी (रत्नम्) = सुन्दर विद्यामय धन (ह) = अवश्य (धत्त्थ) = धारण कराया करो। आप (स्वधावन्तः) = उत्तम अन्न के स्वामी होकर यज्ञेषु यज्ञों में (सं पिबध्वम्) = मिलकर उत्तम रस का पान करो और (मतिभिः) = ज्ञानों से (नः) = हमारे (राधांसि) = धनों को (वि दयध्वम्) = विशेषरूप से रक्षित करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- आनन्द का साक्षात् करनेवाले सत्य से प्रकाशित विद्वान् प्रजाओं में कभी नष्ट न होनेवाले अत्युत्तम विद्यारूपी धन को धारण करावें। जिस विद्या के द्वारा उत्तम अन्न तथा विविध धनों के स्वामी बन सकें। यज्ञ विद्या का प्रसार करके उत्तम आनन्द रस का पान करने की प्रेरणा भी करें।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्विद्वद्भिः किं कर्तव्यमित्याह ॥

अन्वय:

हे स्वधावन्तः स्वर्दृश ऋभुक्षणो विद्वांसो ! यूयं मतिभिः मघवत्सु रत्नं सं धत्थ यज्ञेष्वमृक्तं रत्नमहौषधिरसं पिबध्वं नो राधांसि वि दयध्वम् ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यूयम्) (ह) खलु (रत्नम्) रमणीयधनम् (मघवत्सु) बहुधनयुक्तेषु (धत्थ) धरत (स्वर्दृशः) ये स्वः सुखं यन्ति (ऋभुक्षणः) मेधाविनः (अमृक्तम्) अहिंसितम् (सम्) (यज्ञेषु) सङ्गन्तव्यषु व्यवहारेषु (स्वधावन्तः) बह्वन्नादिपदार्थयुक्ताः (पिबध्वम्) (वि) (नः) अस्माकम् (राधांसि) धनानि (मतिभिः) प्रज्ञाभिः (दयध्वम्) दयां कुरुत ॥२॥
भावार्थभाषाः - ये विद्वांसस्ते प्रजासु ब्रह्मचर्य्यविद्यासत्क्रियामहौषधधनानि च वर्धयित्वा सुखिनः सन्तु ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O scholars of science and technology, visionaries of light, you bring jewels of imperishable wealth for men of power and excellence. O commanders of food, sustenance and power, drink the soma of success in the yajnas of corporate programmes, and with your research and intelligence create the infrastructure for the development and success of our nation.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - विद्वान लोकांनी प्रजेत ब्रह्मचर्य, विद्या, उत्तम क्रिया, मोठमोठी औषधी व धन वाढवून सुखी व्हावे. ॥ २ ॥