प्र ब्रह्मै॑तु॒ सद॑नादृ॒तस्य॒ वि र॒श्मिभिः॑ ससृजे॒ सूर्यो॒ गाः। वि सानु॑ना पृथि॒वी स॑स्र उ॒र्वी पृ॒थु प्रती॑क॒मध्येधे॑ अ॒ग्निः ॥१॥
pra brahmaitu sadanād ṛtasya vi raśmibhiḥ sasṛje sūryo gāḥ | vi sānunā pṛthivī sasra urvī pṛthu pratīkam adhy edhe agniḥ ||
प्र। ब्रह्म॑। ए॒तु॒। सद॑नात्। ऋ॒तस्य॑। वि। र॒श्मिऽभिः॑। स॒सृ॒जे॒। सूर्यः॑। गाः। वि। सानु॑ना। पृ॒थि॒वी। स॒स्रे॒। उ॒र्वी। पृ॒थु। प्रती॑कम्। अधि॑। आ। ई॒धे॒। अ॒ग्निः ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब नव ऋचावाले छत्तीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
गुरुकुल में ज्ञान प्राप्ति
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्यः किं कुर्यादित्याह ॥
अग्निरिव विद्वान् यथा सूर्यो रश्मिभिः पृथु प्रतीकं गाश्च विससृजे अध्येधे यथोर्वी पृथिवी सानुना विसस्रे तथा भवान् ऋतस्य सदनात् ब्रह्म प्रैतु ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात विश्वेदेवांचे कर्म व गुण यांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
