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वंस्व॒ विश्वा॒ वार्या॑णि प्रचेतः स॒त्या भ॑वन्त्वा॒शिषो॑ नो अ॒द्य ॥५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vaṁsva viśvā vāryāṇi pracetaḥ satyā bhavantv āśiṣo no adya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वंस्व॑। विश्वा॑। वार्या॑णि। प्र॒चे॒त॒ इति॑ प्रऽचेतः। स॒त्याः। भ॒व॒न्तु॒। आ॒ऽशिषः॑। नः॒। अ॒द्य ॥५॥

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:17» मन्त्र:5 | अष्टक:5» अध्याय:2» वर्ग:23» मन्त्र:5 | मण्डल:7» अनुवाक:1» मन्त्र:5


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर अध्यापक से विद्यार्थी जन क्या पूछें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (प्रचेतः) उत्तम बुद्धि से युक्त पुरुष ! आप (विश्वा) सब (वार्याणि) ग्रहण करने योग्य विद्वानों का (वंस्व) सेवन कीजिये जिससे (अद्य) आज (नः) हमारी (आशिषः) इच्छा (सत्याः) सत्य (भवन्तु) होवें ॥५॥
भावार्थभाषाः - हे अध्यापक ! आप विवेक से सत्य शास्त्रों को पढ़ाइये और सुशिक्षा करिये, जिससे हम लोग सत्य कामनावाले हों ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वार्य वस्तु लाभ तथा सत्य इच्छायें

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (प्रचेत:) = प्रकृष्ट चेतना को प्राप्त करानेवाले प्रभो! आप (विश्वा) = सब वार्याणि वरणीय धनों को (वंस्व) = प्राप्त कराइये। वस्तुतः ज्ञानपूर्वक सब व्यवहारों को करते हुए हम उत्कृष्ट धनों को प्राप्त करें। [२] (अद्य) = आज (न:) = हमारी (आशिष:) = इच्छायें (सत्याः भवन्तु) = सत्य हों। हमारे मनों में कोई अशुभ इच्छा उठे ही नहीं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम 'प्रचेता' प्रभु के उपासक होते हुए वरणीय धनों को प्राप्त करें और सदा शुभ इच्छाओंवाले हों।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरध्यापकं प्रति विद्यार्थिनः किं पृच्छेयुरित्याह ॥

अन्वय:

हे प्रचेतस्त्वं विश्वा वार्याणि वंस्व यतो नोऽद्याऽऽशिषः सत्या भवन्तु ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (वंस्व) संभज (विश्वा) सर्वाणि (वार्याणि) वरणीयानि प्रज्ञानानि (प्रचेतः) प्रकर्षेण प्रज्ञया युक्त (सत्याः) सत्सु साध्व्यः (भवन्तु) (आशिषः) इच्छा (नः) अस्माकम् (अद्य) अस्मिन् अहनि ॥५॥
भावार्थभाषाः - हे अध्यापक ! त्वं विवेकेन सत्यानि शास्त्राण्यध्यापय सुशिक्षां कुरु येन वयं सत्यकामा भवेम ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O man of knowledge and enlightenment, acquire and disseminate all the cherished gifts and virtues of the world so that all our hopes and ambitions for a full living may be truly fulfilled here and now.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे अध्यापका! तू विवेकाने सत्य शास्त्राचे अध्यापन कर व सुशिक्षण दे. ज्यामुळे आम्ही सत्य कामनायुक्त बनावे. ॥ ५ ॥