अग्ने॒ भव॑ सुष॒मिधा॒ समि॑द्ध उ॒त ब॒र्हिरु॑र्वि॒या वि स्तृ॑णीताम् ॥१॥
agne bhava suṣamidhā samiddha uta barhir urviyā vi stṛṇītām ||
अग्ने॑। भव॑। सु॒ऽस॒मिधा॑। सम्ऽइ॑द्धः। उ॒त। ब॒र्हिः। उ॒र्वि॒या। वि। स्तृ॒णी॒ता॒म् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब विद्यार्थी किसके तुल्य कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
ज्ञान व पवित्र हृदय
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ विद्यार्थिनः किंवत्कीदृशा भवेयुरित्याह ॥
हे अग्ने ! यथा सुषमिधा समिद्धोऽग्निर्भवति तथा भव उत यथा वह्निरुर्विया बर्हिषि स्तृणाति तथाविधो भवान् विस्तृणीताम् ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अध्यापक व विद्यार्थ्यांच्या कृत्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूर्क्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
