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देवता: अग्निः ऋषि: वसिष्ठः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
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यः पञ्च॑ चर्ष॒णीर॒भि नि॑ष॒साद॒ दमे॑दमे। क॒विर्गृ॒हप॑ति॒र्युवा॑ ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaḥ pañca carṣaṇīr abhi niṣasāda dame-dame | kavir gṛhapatir yuvā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः। पञ्च॑। च॒र्ष॒णीः। अ॒भि। नि॒ऽस॒साद॑। दमे॑ऽदमे। क॒विः। गृ॒हऽप॑तिः। युवा॑ ॥२॥

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:15» मन्त्र:2 | अष्टक:5» अध्याय:2» वर्ग:18» मन्त्र:2 | मण्डल:7» अनुवाक:1» मन्त्र:2


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे संन्यासी और गृहस्थ परस्पर कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो (कविः) उत्तम ज्ञान को प्राप्त हुआ संन्यासी (दमेदमे) घर-घर में (पञ्च) पाँच (चर्षणीः) मनुष्यों वा प्राणों को (अभि, निषसाद) स्थिर करे उसका (युवा) पूर्ण ब्रह्मचर्य्य के साथ वर्त्तमान (गृहपतिः) घर का रक्षक युवा पुरुष निरन्तर सत्कार करे ॥२॥
भावार्थभाषाः - संन्यासी जन सदा सब जगह भ्रमण करे और गृहस्थ इस विरक्त का सत्कार करे और इससे उपदेश सुने ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दमे दमे निषसाद्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो प्रभु (पञ्च चर्षणी:) = पाँच भागों में विभक्त [ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य, शूद्र व निषाद] मनुष्यों के (अभि) = अभिमुख (दमे दमे) = प्रत्येक शरीर गृह में (निषसाद) = अधिष्ठातृरूपेण निषण्ण हैं। वे प्रभु (कवि) = क्रान्तप्रज्ञ हैं, (गृहपतिः) = इस शरीररूप गृह के रक्षक हैं, (युवा) = सब बुराइयों को दूर करनेवाले व अच्छाइयों को मिलानेवाले हैं। ज्ञान को देकर वे हमारे जीवनों को पवित्र करते हैं। [२] प्रभु जैसे ब्राह्मणों का ध्यान करते हैं, उसी प्रकार इन निषादों का भी। इनको भी विविध प्रकार से प्रेरणा देते हुए प्रभु सन्मार्ग पर लाने की व्यवस्था करते हैं। कष्टों का आना भी उसी व्यवस्था का एक भाग होता है। हुए हमारे
भावार्थभाषाः - भावार्थ-प्रभु प्रत्येक शरीर गृह में स्थित हैं। वे क्रान्तप्रज्ञ प्रभु ज्ञान को प्राप्त कराते इन गृहों का रक्षण व पवित्रीकरण करते हैं।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तौ यतिगृहस्थौ परस्परं कथं वर्तेयातामित्याह ॥

अन्वय:

यः कविरतिथिर्दमेदमे पञ्च चर्षणीरभिनिषसाद तं युवा गृहपतिः सततं सत्कुर्यात् ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) (पञ्च) (चर्षणीः) मनुष्यान् (अभि) आभिमुख्ये (निषसाद) निषीदेत् (दमेदमे) गृहेगृहे (कविः) जातप्रज्ञः (गृहपतिः) गृहस्य पालकः (युवा) पूर्णेन ब्रह्मचर्येण युवावस्थां प्राप्य कृतविवाहः ॥२॥
भावार्थभाषाः - यतिः सदा सर्वत्र भ्रमणं कुर्याद्गृहस्थश्चैतं सदैव सत्कुर्यादत उपदेशाञ्छृणुयात् ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - To Agni, who abides with and stabilises the five orders of society in every household from door to door, the wise visionary, master protector and promoter of the home and family, youthful spirit and power of the light and fire of life and pranic energy.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - संन्यासी लोकांनी सदैव सर्वत्र भ्रमण करावे व गृहस्थांनी या विरक्तांचा सत्कार करावा व त्यांचे उपदेश ऐकावेत. ॥ २ ॥