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प॒रः सो अ॑स्तु त॒न्वा॒३॒॑ तना॑ च ति॒स्रः पृ॑थि॒वीर॒धो अ॑स्तु॒ विश्वा॑: । प्रति॑ शुष्यतु॒ यशो॑ अस्य देवा॒ यो नो॒ दिवा॒ दिप्स॑ति॒ यश्च॒ नक्त॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

paraḥ so astu tanvā tanā ca tisraḥ pṛthivīr adho astu viśvāḥ | prati śuṣyatu yaśo asya devā yo no divā dipsati yaś ca naktam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प॒रः । सः । अ॒स्तु॒ । त॒न्वा॑ । तना॑ । च॒ । ति॒स्रः । पृ॒थि॒वीः । अ॒धः । अ॒स्तु॒ । विश्वाः॑ । प्रति॑ । शु॒ष्य॒तु॒ । यशः॑ । अ॒स्य॒ । दे॒वाः॒ । यः । नः॒ । दिवा॑ । दिप्स॑ति । यः । च॒ । नक्त॑म् ॥ ७.१०४.११

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:104» मन्त्र:11 | अष्टक:5» अध्याय:7» वर्ग:7» मन्त्र:1 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:11


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह अन्यायकारी पुरुष (तन्वा) शरीर से (तना) सन्तानों से (परः, अस्तु) हीन हो जाय (च) और (तिस्रः, पृथिवीः) तीनों लोकों से (अधः, अस्तु) नीचे हो जाय और (देवाः) हे भगवन् ! (अस्य, यशः) इसका यश (विश्वाः, प्रतिशुष्यतु) सब प्रकार से नष्ट हो जाय, (यः) जो राक्षस (नः) सदाचारी हम लोगों को (दिवा) प्रत्यक्ष (नक्तम्) तथा अप्रत्यक्ष में (दिप्सति) हानि पहुँचाता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - जो लोग सदाचारी लोगों को दुःख पहुँचाते हैं, वे तीनों लोकों से अर्थात् भूत, भविष्यत् वर्तमान तीनों काल के सुखों से वञ्चित हो जाते हैं। वा यों कहो कि भूतकाल में उनका ऐतिहासिक यश नष्ट हो जाता है और वर्तमानकाल में अशान्ति उत्पन्न होकर उनके शान्त्यादि सुख नाश को प्राप्त हो जाते हैं और भविष्य में उनका अभ्युदय नहीं होता, इस प्रकार वे तीनों लोकों से परे हो जाते हैं अर्थात् वञ्चित रहते हैं ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दुष्ट का सामाजिक बहिष्कार

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - हे (देवाः) = विद्वान् मनुष्यो ! (यः च) = और जो (नः) = हमें (दिवा:) = दिन में या (नक्तम्) = रात में (दिप्सति) = हानि पहुँचाता, (सः) = वह (तन्वा तना च) = शरीर और पुत्रादि से भी (परः अस्तु) = दूर हो । वह (विश्वा:) = समस्त (तित्रः) = तीनों (पृथिवीः) = भूमियों, लोकों से (अधः अस्तु) = नीचे रहे, वह गढ़े में, या नीची कोटि में रक्खा जावे। (अस्य यशः) = उसका यश, बल प्रति (शुष्यतु) = प्रतिदिन सूखता जाय।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जो दुष्ट प्रजाजनों को दिन में या रात में हानि पहुँचाता है उसका सामाजिक बहिष्कार किया जावे जिससे उसका यश और बल दोनों नष्ट हो जाएगा।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) स दुराचारी (तन्वा) शरीरेण (तना) सन्तानेन च (परः, अस्तु) हीयतां (च) तथा (तिस्रः, पृथिवीः) लोकत्रयादपि (अधः, अस्तु) नीचैः पततु (देवाः) हे भगवन् ! (अस्य, यशः) अस्य दुष्कर्मणः (यशः) कीर्त्तिः (विश्वाः प्रति शुष्यतु) सर्वथा नश्यतु (यः) यो राक्षसः (नः) सत्कर्मणोऽस्मान् (दिवा) समक्षम् (नक्तम्) अप्रत्यक्षं यो (दिप्सति) तापयति हानौ तत्परो भवति स नीचैः पतत्विति ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O divinities of nature and humanity, he who wants to injure and destroy us in the day and in the night, must stay far off by his personal presence and also by the progeny of his evil tendencies and even fall lower than all the three orders of earthly existence, i.e., lower far than the good, the bad and the indifferent. His honour and reputation would dry up and evaporate to zero and there would be none even to remember him after. Let it be so with such a person.