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देवता: अग्निः ऋषि: वसिष्ठः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः
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इन्द्रं॑ नो अग्ने॒ वसु॑भिः स॒जोषा॑ रु॒द्रं रु॒द्रेभि॒रा व॑हा बृ॒हन्त॑म्। आ॒दि॒त्येभि॒रदि॑तिं वि॒श्वज॑न्यां॒ बृह॒स्पति॒मृक्व॑भिर्वि॒श्ववा॑रम् ॥४॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indraṁ no agne vasubhiḥ sajoṣā rudraṁ rudrebhir ā vahā bṛhantam | ādityebhir aditiṁ viśvajanyām bṛhaspatim ṛkvabhir viśvavāram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्र॑म्। नः॒। अ॒ग्ने॒। वसु॑ऽभिः। स॒ऽजोषाः॑। रु॒द्रम्। रु॒द्रेभिः। आ। व॒ह॒। बृ॒हन्त॑म्। आ॒दि॒त्येभिः॑। अदि॑तिम्। वि॒श्वऽज॑न्याम्। बृह॒स्पति॑म्। ऋक्व॑ऽभिः। वि॒श्वऽवा॑रम् ॥४॥

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:10» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:2» वर्ग:13» मन्त्र:4 | मण्डल:7» अनुवाक:1» मन्त्र:4


स्वामी दयानन्द सरस्वती

कौन विद्वान् निरन्तर सेवने योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन् (सजोषाः) तुल्य सेवनकर्त्ता आप (नः) हमारे लिये (वसुभिः) पृथिव्यादि के साथ (इन्द्रम्) विद्युत् अग्नि को (रुद्रेभिः) प्राणों के साथ (बृहन्तम्) बड़े (रुद्रम्) जीवात्मा को (आदित्येभिः) बारह महीनों से (विश्वजन्याम्) संसारोत्पत्ति की हेतु (अदितिम्) अखण्डित कालविद्या को और (ऋक्वभिः) ऋग्वेदादि से (विश्ववारम्) सब के स्वीकार करने योग्य (बृहस्पतिम्) बड़ी ऋग्वेदादि वाणी के रक्षक परमात्मा को (आ, वहा) अच्छे प्रकार प्राप्त कीजिये ॥४॥
भावार्थभाषाः - जो ही पृथिव्यादि विद्या के साथ बिजुली की विद्या को, प्राणविद्या के साथ जीवविद्या को, कालविद्या के साथ प्रकृति के विज्ञान को और वेदविद्या से परमात्मा के विज्ञान कराने को समर्थ होता है, उसी का सब लोग विद्या प्राप्ति के लिये आश्रय करें ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'इन्द्र [वसु] रुद्र व आदित्यों' के सम्पर्क में

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन्! (वसुभिः) = वसुओं के साथ (सजोषाः) = संगत हुए-हुए आप (नः) = लिये (इन्द्रम्) = इन्द्र को (आवहा) प्राप्त कराइये। इस जितेन्द्रिय पुरुष के सम्पर्क में हम भी इन्द्र हमारे लिये व दूर जितेन्द्रिय बनें। (रुद्रेभिः) = [रुत्+र अथवा रुत्+द्र] ज्ञानोपदेश देनेवाले अथवा रोगों को भगानेवाले इन रुद्रों के साथ संगत हुए हुए आप (बृहन्तम्) = वृद्धि के कारणभूत अथवा खूब वृद्ध [बढ़े हुए] (रुद्रम्) = इस ज्ञानोपदेष्टा व रोगहर्ता को हमारे साथ मिलाइये। [२] (आदित्येभिः) = सब ज्ञानों का आदान करनेवाले इन विद्वानों के द्वारा आप (विश्वजन्याम्) = सब मनुष्यों का हित करनेवाली (अदितिम्) = वेदवाणी [नि० १।११] को हमें प्राप्त कराइये। (ऋक्वभिः) = स्तुत्य जीवनवाले अथर्वाङ्गिरसों के द्वारा (विश्ववारम्) = सब से वरने के योग्य अथवा सब वरणीय ज्ञानोंवाले बृहस्पतिम् सर्वोत्कृष्ट ज्ञानी को हमें प्राप्त कराइये ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ‘इन्द्र [वसु], रुद्र व आदित्य' विद्वानों के सम्पर्क में आयें। ये हमें इस वेदवाणी का ज्ञान दें तथा बृहस्पति [सर्वज्ञ प्रभु] को प्राप्त करायें।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

को विद्वान् सततं सेवनीय इत्याह ॥

अन्वय:

हे अग्ने ! सजोषास्त्वं नो वसुभिः रुद्रेभिर्बृहन्तं रुद्रमादित्येभिर्विश्वजन्यामदितिमृक्वभिर्विश्ववारं बृहस्पतिमा वहा ॥४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रम्) विद्युतम् (नः) अस्माकम् (अग्ने) पावक इव विद्वन् (वसुभिः) पृथिव्यादिभिः (सजोषाः) समानसेवी (रुद्रम्) जीवात्मानम् (रुद्रेभिः) प्राणैस्सह (आ वहा) समन्तात्प्रापय। अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (बृहन्तम्) महान्तम् (आदित्येभिः) संवत्सरस्य मासैः (अदितिम्) अखण्डितां कालविद्याम् (विश्वजन्याम्) विश्वं जन्यं यया ताम् (बृहस्पतिम्) बृहत्या ऋग्वेदादिवेदवाचः पालकं परमात्मानम् (ऋक्वभिः) ऋग्वेदादिभिः (विश्ववारम्) सर्वैर्वरणीयम् ॥४॥
भावार्थभाषाः - यो हि पृथिव्यादिविद्यया सह विद्युद्विद्यां प्राणविद्यया सह जीवविद्यां कालविद्यया सह प्रकृतिविज्ञानं वेदविद्यया परमात्मानं ज्ञापयितुं शक्नोति तमेव सर्वे विद्यार्थमाश्रयन्तु ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light and life, generous, loving and kind to all, pray bring us, lead us, to Indra, cosmic energy with the wealth and abundance of earth and other supports of life, to Rudra the soul, with pranic energies, to Aditi, infinite and eternal time and space, with a vision of the suns and origin of the universe, and to the universal lord and spirit of existence with divination into the original revelation.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जो पृथ्वी विद्येबरोबर विद्युतविद्या, प्राणविद्येबरोबर जीवविद्या, कालविद्येबरोबर प्रकृति विज्ञान व वेदविद्येद्वारे परमात्म्याचे विज्ञान करविण्यास समर्थ असतो त्याचाच सर्व लोकांनी विद्याप्राप्तीसाठी आश्रय घ्यावा. ॥ ४ ॥