उ॒षो न जा॒रः पृ॒थु पाजो॑ अश्रे॒द्दवि॑द्युत॒द्दीद्य॒च्छोशु॑चानः। वृषा॒ हरिः॒ शुचि॒रा भा॑ति भा॒सा धियो॑ हिन्वा॒न उ॑श॒तीर॑जीगः ॥१॥
uṣo na jāraḥ pṛthu pājo aśred davidyutad dīdyac chośucānaḥ | vṛṣā hariḥ śucir ā bhāti bhāsā dhiyo hinvāna uśatīr ajīgaḥ ||
उ॒षः। न। जा॒रः। पृ॒थु। पाजः॑। अ॒श्रे॒त्। दवि॑द्युतत्। दीद्य॑त्। शोशु॑चानः। वृषा॑। हरिः॑। शुचिः॑। आ। भा॒ति॒। भा॒सा। धियः॑। हि॒न्वा॒नः। उ॒श॒तीः। अ॒जी॒ग॒रिति॑ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पाँच ऋचावाले दशवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में अब विद्वान् किसके तुल्य क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दविद्युतत्-दीद्यत्-शोशुचानः
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ विद्वान् किंवत्किं कुर्य्यादित्याह ॥
हे विद्वन् ! यथा जारो न शोशुचानो वृषा हरिरुशतीर्धियो हिन्वानोऽग्निरजीगो भासा सर्वमा भाति पृथु पाजोऽश्रेत् सर्वं दविद्युतदुषइव शुचिः स्वयं दीद्यत्तथा त्वं विधेहि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नी, विद्वान व विदुषीच्या कर्तव्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
