अह॑श्च कृ॒ष्णमह॒रर्जु॑नं च॒ वि व॑र्तेते॒ रज॑सी वे॒द्याभिः॑। वै॒श्वा॒न॒रो जाय॑मानो॒ न राजावा॑तिर॒ज्ज्योति॑षा॒ग्निस्तमां॑सि ॥१॥
ahaś ca kṛṣṇam ahar arjunaṁ ca vi vartete rajasī vedyābhiḥ | vaiśvānaro jāyamāno na rājāvātiraj jyotiṣāgnis tamāṁsi ||
अहः॑। च॒। कृ॒ष्णम्। अहः॑। अर्जु॑नम्। च॒। वि। व॒र्ते॒ते॒ इति॑। रज॑सी॒ इति॑। वे॒द्याभिः॑। वै॒श्वा॒न॒रः। जाय॑मानः। न। राजा॑। अव॑। अ॒ति॒र॒त्। ज्योति॑षा। अ॒ग्निः। तमां॑सि ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब सात ऋचावाले नवम सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा प्रजा परस्पर कैसे वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दिन-रात के चक्र में प्रभु की महिमा
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ राजप्रजे परस्परं कथं वर्त्तेयातामित्याह ॥
हे मनुष्या ! अहः कृष्णं चाऽहरर्जुनं च रजसी वेद्याभिस्सह वि वर्त्तेते राजा न जायमानो वैश्वानरोऽग्निर्ज्योतिषा तमांस्यवातिरत् ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How should the rulers and their subjects deal with one another is told.
O men! one half of the day (night) is dark and the other one is bright which is endowed with straight movements and other qualities. Both day and night move on with (our. Ed.) knowledge and actions. The fire when kindled with its luster overcomes the darkness like the sun illuminating the world.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात दिवस व रात्र, अपत्य, जीव, परमेश्वराच्या स्थितीचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
