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त्वद्विप्रो॑ जायते वा॒ज्य॑ग्ने॒ त्वद्वी॒रासो॑ अभिमाति॒षाहः॑। वैश्वा॑नर॒ त्वम॒स्मासु॑ धेहि॒ वसू॑नि राजन्त्स्पृह॒याय्या॑णि ॥३॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvad vipro jāyate vājy agne tvad vīrāso abhimātiṣāhaḥ | vaiśvānara tvam asmāsu dhehi vasūni rājan spṛhayāyyāṇi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वत्। विप्रः॑। जा॒य॒ते॒। वा॒जी। अ॒ग्ने॒। त्वत्। वी॒रासः॑। अ॒भि॒मा॒ति॒ऽसहः॑। वैश्वा॑नर। त्वम्। अ॒स्मासु॑। धे॒हि॒। वसू॑नि। रा॒ज॒न्। स्पृ॒ह॒याय्या॑णि ॥३॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:7» मन्त्र:3 | अष्टक:4» अध्याय:5» वर्ग:9» मन्त्र:3 | मण्डल:6» अनुवाक:1» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (वैश्वानर) संपूर्ण जनों में अग्रणी (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रतापी विद्वन् (राजन्) राजन् ! जिस कारण से (त्वत्) आपके समीप से (विप्रः) बुद्धिमान् (वाजी) वेगयुक्त (जायते) होता है और (त्वत्) आपके समीप से (अभिमातिषाहः) अभिमानयुक्त शत्रुओं के सहनेवाले (वीरासः) शूरवीर जन प्रकट होते हैं इससे (त्वम्) आप (अस्मासु) हम लोगों में (स्पृहयाय्याणि) इच्छा के विषय होने योग्य (वसूनि) धनों को (धेहि) धारण करिये ॥३॥
भावार्थभाषाः - वही राजा होने को योग्य है जिसके सङ्ग दुष्ट जन भी श्रेष्ठ, कायर भी शूरवीर और कृपण भी दाता होते हैं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य' के निर्माता प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (त्वद्) = आप से ही, आपकी उपासना से शक्ति को पाकर ही (विप्रः) = ज्ञानी पुरुष (वाजी) = हविर्लक्षण अन्नोंवाला, अर्थात् यज्ञशील जायते बनता है। प्रभु का उपासक ज्ञानी व यज्ञशील ब्राह्मण बनता है। (त्वद्) = आप से ही (वीरासः) = शत्रुओं को विशेषरूप से कम्पित करनेवाले [वि + ईर] क्षत्रिय लोग (अभिमातिषाहः) = शत्रुओं का पराभव करनेवाले होते हैं। [२] हे (राजन्) = देदीप्यमान वैश्वानर सब मनुष्यों के हितकर व आगे ले चलनेवाले [नृनये] प्रभो! (त्वम्) = आप (अस्मासु) = हमारे में (स्पृहयाय्याणि) = स्पृहणीय चाहने योग्य वसूनि धनों को (धेहि) = धारण करिये। आपकी कृपा से हम सुपथ से धनों के कमानेवाले वैश्यवर्ग में जन्म लें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु की उपासना हमें [क] यज्ञशील ज्ञानी ब्राह्मण बनाती है । [ख] यह उपासना हमें शत्रुओं को कुचल देनेवाला वीर क्षत्रिय बनाती है। [ग] तथा इस उपासना से हम सुपथ से धनार्जन करनेवाले वैश्य बनते हैं। उपासना के अभाव में हम शूद्र के शूद्र रह जाते हैं 'जन्मना जायते शूद्रः' शूद्र तो हम उत्पन्न हुए ही थे । उपासना के अभाव में हम कोई उन्नति नहीं करते ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स राजा कीदृशो भवेदित्याह ॥

अन्वय:

हे वैश्वानराऽग्ने राजन् ! यस्मात् त्वद्विप्रो वाजी जायते त्वदभिमातिषाहो वीरासो जायन्ते ततस्त्वमस्मासु स्पृहयाय्याणि वसूनि धेहि ॥३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वत्) तव सकाशात् (विप्रः) मेधावी (जायते) (वाजी) वेगवान् (अग्ने) पावकवत्प्रतापिन् विद्वन् (त्वत्) (वीरासः) शूरवीराः (अभिमातिषाहः) येऽभिमात्याऽभिमानेन युक्ताञ्छत्रून् सहन्ते (वैश्वानर) विश्वेषु नरेषु नायक (त्वम्) (अस्मासु) (धेहि) (वसूनि) (राजन्) (स्पृहयाय्याणि) स्पृहणीयानि ॥३॥
भावार्थभाषाः - स एव राजा भवितुं योग्यो यस्य सङ्गेन दुष्टा अपि श्रेष्ठाः कातरा अपि शूरवीराः कृपणा अपि दातारो भवन्ति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O leading light of the world, Agni, by you arises the dedicated scholar, energy, sustenance and progress, and the warriors who brave the challenges and win. O Vaishvanara, fire of earthly existence, brilliant leader and ruler, lead us to wealths of the world worthy of being fought for and won.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The necessary virtues of a king are told.

अन्वय:

O highly learned king ! you are mighty like the fire, as it is from you as protector that a mighty and quick- going (active) wise man is born (a good ruler or government creates congenial conditions). It is for you (under your protection) that heroes spring up conditional (atmosphere to make people wise. Ed. to subdue all haughty foes. Therefore, O leader among all men ! bestow you on us excellent wealth of all kinds, worthy to be longed for.

भावार्थभाषाः - That man alone is fit to be a ruler by whose association even the wicked become good, cowards become brave and miserly fellows become donors.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ज्याच्या संगतीने दुष्ट लोकही श्रेष्ठ, भित्राही शूरवीर व कृपणही दाता होतो तोच राजा होण्यायोग्य असतो. ॥ ३ ॥