ओ॒कि॒वांसा॑ सु॒ते सचाँ॒ अश्वा॒ सप्ती॑इ॒वाद॑ने। इन्द्रा॒ न्व१॒॑ग्नी अव॑से॒ह व॒ज्रिणा॑ व॒यं दे॒वा ह॑वामहे ॥३॥
okivāṁsā sute sacām̐ aśvā saptī ivādane | indrā nv agnī avaseha vajriṇā vayaṁ devā havāmahe ||
ओ॒कि॒ऽवांसा॑। सु॒ते। सचा॑। अश्वा॑। सप्ती॑इ॒वेति॒ सप्ती॑ऽइव। आद॑ने। इन्द्रा॑। नु। अ॒ग्नी इति॑। अव॑सा। इ॒ह। व॒ज्रिणा॑। व॒यम्। दे॒वा। ह॒वा॒म॒हे॒ ॥३॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर विद्वान् जन क्या जानकर कैसे हों, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सचा ओकिवांसा 'वज्रिणा देवा'
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्विद्वांसः किं विज्ञाय कीदृशा भवेयुरित्याह ॥
हे मनुष्या ! यथा देवा वयमवसेह सुते सचाऽश्वा वज्रिणौकिवांसा सप्तीइवादने वर्त्तमानाविन्द्राग्नी नु हवामहे तथेमौ यूयमपि प्रशंसत ॥३॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How should the scholars be - knowing what-is told.
O men ! as learned persons praise with knowledge, the air and electricity, which are pervasive, are endowed with the power, of manufacturing admirable weapons, which are in this world, like two fellow horses, united in the eating of the fodder, so you should, also admire their properties.
