उप॑ नः सू॒नवो॒ गिरः॑ शृ॒ण्वन्त्व॒मृत॑स्य॒ ये। सु॒मृ॒ळी॒का भ॑वन्तु नः ॥९॥
upa naḥ sūnavo giraḥ śṛṇvantv amṛtasya ye | sumṛḻīkā bhavantu naḥ ||
उप॑। नः॒। सू॒नवः॑। गिरः॑। शृ॒ण्वन्तु॑। अ॒मृत॑स्य। ये। सु॒ऽमृ॒ळी॒काः। भ॒व॒न्तु॒। नः॒ ॥९॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर मनुष्यों को कैसा नियम करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
ज्ञानरुचि सन्तानें
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्मनुष्यैः कीदृशो नियमः कर्त्तव्य इत्याह ॥
हे राजन्विद्वांसो वा ! ये नः सूनवः स्युस्तेऽमृतस्य गिर उप शृण्वन्तु सुमृळीका भूत्वा नः सेवका भवन्तु ॥९॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should be the law (regarding compulsory education)-is told.
O king or enlightened men ! let all our sons listen to the speeches of the imperishable knowledge and being happy (well by the observance of Brahmcharya (abstinence or celibacy) and righteousness let them serve us.
