यो वो॑ देवा घृ॒तस्नु॑ना ह॒व्येन॑ प्रति॒भूष॑ति। तं विश्व॒ उप॑ गच्छथ ॥८॥
yo vo devā ghṛtasnunā havyena pratibhūṣati | taṁ viśva upa gacchatha ||
यः। वः॒। दे॒वाः॒। घृ॒तऽस्नु॑ना। ह॒व्येन॑। प्र॒ति॒ऽभूष॑ति। तम्। विश्वे॑। उप॑। ग॒च्छ॒थ॒ ॥८॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर अध्यापक और अध्ययन करनेवाले परस्पर कैसे वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सात्त्विक भोजन, ज्ञान व दिव्यगुणों की प्राप्ति
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनरध्यापकाऽध्येतारः परस्परं कथं वर्तेरन्नित्याह ॥
हे देवा ! यो घृतस्नुना हव्येन वः प्रतिभूषति तं विश्वे यूयमुप गच्छथ ॥८॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How should the teachers and the taught deal with one another-is told.
O teachers and preachers ! you all go to that man, who adorns you with admirable and butter like pure reading and hearing which is worth accepting and worth giving.
