वांछित मन्त्र चुनें

विश्वे॑ दे॒वा ऋ॑ता॒वृध॑ ऋ॒तुभि॑र्हवन॒श्रुतः॑। जु॒षन्तां॒ युज्यं॒ पयः॑ ॥१०॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśve devā ṛtāvṛdha ṛtubhir havanaśrutaḥ | juṣantāṁ yujyam payaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विश्वे॑। दे॒वाः। ऋ॒त॒ऽवृधः॑। ऋ॒तुऽभिः॑। ह॒व॒न॒ऽश्रुतः॑। जु॒षन्ता॑म्। युज्य॑म्। पयः॑ ॥१०॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:52» मन्त्र:10 | अष्टक:4» अध्याय:8» वर्ग:15» मन्त्र:5 | मण्डल:6» अनुवाक:5» मन्त्र:10


349 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्य क्या कामना कर विद्याओं को प्राप्त होवें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (ऋतावृधः) सत्य विद्या के बढ़ानेवालो (हवनश्रुतः) जो अध्ययन को सुनते हैं, वे (विश्वे, देवाः) सब विद्वान् ! आप लोग (ऋतुभिः) वसन्तादिकों के साथ (युज्यम्) समाधान करने योग्य (पयः) दूध, जल वा अन्न को (जुषन्ताम्) सेवें ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जो अध्ययन करने और परीक्षा कराने को चाहें वे मद करने, कुत्सित बुद्धि वा नाश करनेवाले पदार्थों को छोड़ के दुग्ध आदि बुद्धि के बढ़ानेवाले उत्तम पदार्थों को सेवें ॥१०॥
349 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

युज्यं पयः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विश्वे देवा:) = सब देव वृत्ति के पुरुष (ऋतावृधः) = ऋत का वर्धन करनेवाले होते हैं, ये यज्ञिय जीवनवाले बनते हैं। (ऋतुभिः) = समयानुसार (हवनश्रुतः) = गुरुओं के आह्वान को सुननेवाले होते हैं [उपहूतो वाचस्पतिरुपास्मान् वाचस्पतिर्हृयताम् अ०] । [२] ये देववृत्ति के पुरुष (युज्यं पयः) = प्रभु के साथ सम्पर्क करानेवाले ज्ञानदुग्ध का (जुषन्ताम्) = प्रीतिपूर्वक सेवन करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञशील बनें। आचार्यों के समीप बैठकर उस ज्ञान को प्राप्त करें जो प्रभु को प्राप्त करानेवाला होता है ।
349 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्याः किमुशित्वा विद्याः प्राप्नुयुरित्याह ॥

अन्वय:

हे ऋतावृधो हवनश्रुतो विश्वे देवा ! भवन्त ऋतुभिर्युज्यं पयो जुषन्ताम् ॥१०॥

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वे) सर्वे (देवाः) विद्वांसः (ऋतावृधः) सत्यविद्यावर्धकाः (ऋतुभिः) वसन्तादिभिः (हवनश्रुतः) ये हवनमध्ययनं शृण्वन्ति ते (जुषन्ताम्) (युज्यम्) समाधातुमर्हम् (पयः) दुग्धमुदकमन्नं वा। पय इत्युदकनाम ॥ (निघं०१.१२) अन्ननाम च (निघं०२.७) ॥१०॥
भावार्थभाषाः - येऽध्येतुं परीक्षयितुं चेच्छेयुस्ते मादककुत्सितबुद्धिनाशकानि द्रव्याणि त्यक्त्वा पय आदीनि बुद्धिवर्द्धकानि सेवेरन् ॥१०॥
349 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the leading lights of the world, sages and scholars, generous and brilliant, expanding the bounds of knowledge and universal law in truth and development, listen to our invitation, love, honour and bless the liquid and milky investments in the yajnic programmes of research and progress according to the seasons of time and social requirements.
349 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Desiring what should men attain knowledge is told.

अन्वय:

O all enlightened persons! who are disseminators and supporters of truth and knowledge, are hearers of what has been taught by you, should take water, milk and suitable good food according to the spring and other seasons.

भावार्थभाषाः - Those, who desire to study and examine, should give up the use of all intoxicants which spoil intellect and should take milk and other articles which increase the intellectual power.
349 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे अध्ययनाची व परीक्षा देण्याची इच्छा बाळगतात त्यांनी मादक द्रव्याचे, कुत्सित बुद्धी उत्पन्न करणाऱ्या पदार्थाचे ग्रहण करू नये. दूध वगैरे बुद्धी वाढविणारे पदार्थ घ्यावेत. ॥ १० ॥