मा व॒ एनो॑ अ॒न्यकृ॑तं भुजेम॒ मा तत्क॑र्म वसवो॒ यच्चय॑ध्वे। विश्व॑स्य॒ हि क्षय॑थ विश्वदेवाः स्व॒यं रि॒पुस्त॒न्वं॑ रीरिषीष्ट ॥७॥
mā va eno anyakṛtam bhujema mā tat karma vasavo yac cayadhve | viśvasya hi kṣayatha viśvadevāḥ svayaṁ ripus tanvaṁ rīriṣīṣṭa ||
मा। वः॒। एनः॑। अ॒न्यऽकृ॑तम्। भु॒जे॒म॒। मा। तत्। क॒र्म॒। व॒स॒वः॒। यत्। चय॑ध्वे। विश्व॑स्य। हि। क्षय॑थ। वि॒श्व॒ऽदे॒वाः॒। स्व॒यम्। रि॒पुः। त॒न्व॑म्। रि॒रि॒षी॒ष्ट॒ ॥७॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
[पापी अपने आप से नष्ट हो ]
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
हे वसवो विश्वदेवा ! यूयं विश्वस्य मध्ये यच्चयध्वे यद्धि क्षयथ यथा रिपुस्तन्वं स्वशरीरं रीरिषीष्ट तथा तद्वोऽन्यकृतमेनो वयं मा भुजेम तद्दुष्टं कर्म मा कर्म ॥७॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should men do-is told.
O enlightened persons ! whatever you gather while living in the world and where you dwell happily, let us participate in that and enjoy delight. Let us never be accomplices or partners in anybody's sinful act. Let us never perform any wicked deed.
