हु॒वे वो॑ दे॒वीमदि॑तिं॒ नमो॑भिर्मृळी॒काय॒ वरु॑णं मि॒त्रम॒ग्निम्। अ॒भि॒क्ष॒दाम॑र्य॒मणं॑ सु॒शेवं॑ त्रा॒तॄन्दे॒वान्त्स॑वि॒तारं॒ भगं॑ च ॥१॥
huve vo devīm aditiṁ namobhir mṛḻīkāya varuṇam mitram agnim | abhikṣadām aryamaṇaṁ suśevaṁ trātṝn devān savitāram bhagaṁ ca ||
हु॒वे। वः॒। दे॒वीम्। अदि॑तिम्। नमः॑ऽभिः। मृ॒ळी॒काय॑। वरु॑णम्। मि॒त्रम्। अ॒ग्निम्। अ॒भि॒ऽक्ष॒दाम्। अ॒र्य॒मण॑म्। सु॒ऽशेव॑म्। त्रा॒तॄन्। दे॒वान्। स॒वि॒तार॑म्। भग॑म्। च॒ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पन्द्रह ऋचावाले पचासवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् जन किसलिये क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वमाता व देवों का आह्वान
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ विद्वांसः किमर्थं किं कुर्य्युरित्याह ॥
हे मनुष्या ! यथाऽहं नमोभिर्वोऽभिक्षदां मृळीकायाऽदितिं देवीं वरुणं मित्रमग्निमर्यमणं सुशेवं त्रातॄन् देवान् सवितारं भगं च हुवे तथैतानस्मदर्थं यूयमाह्वयत ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should the learned persons do for whom―is told.
O men ! as I invite and accept for your welfare, with honor and food, a brilliant highly learned lady, mother of pure character, an exalted man like the Udana, friend who is dear like Prana (breath), Purifier like the fire, dispenser of justice, one who does not give alms to undeserving hypocrites, giver of good happiness. A king, who urges his subjects to do noble deeds, enlightened protector and prosperity, so you should also invite them for our welfare.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात विश्वदेवाचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची यापूर्वीच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
