वांछित मन्त्र चुनें

प्र॒थ॒म॒भाजं॑ य॒शसं॑ वयो॒धां सु॑पा॒णिं दे॒वं सु॒गभ॑स्ति॒मृभ्व॑म्। होता॑ यक्षद्यज॒तं प॒स्त्या॑नाम॒ग्निस्त्वष्टा॑रं सु॒हवं॑ वि॒भावा॑ ॥९॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prathamabhājaṁ yaśasaṁ vayodhāṁ supāṇiṁ devaṁ sugabhastim ṛbhvam | hotā yakṣad yajatam pastyānām agnis tvaṣṭāraṁ suhavaṁ vibhāvā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र॒थ॒म॒ऽभाज॑म्। य॒शस॑म्। व॒यः॒ऽधाम्। सु॒ऽपा॒णिम्। दे॒वम्। सु॒ऽगभ॑स्तिम्। ऋभ्व॑म्। होता॑। य॒क्ष॒त्। य॒ज॒तम्। प॒स्त्या॑नाम्। अ॒ग्निः। त्वष्टा॑रम्। सु॒ऽहव॑म्। वि॒भाऽवा॑ ॥९॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:49» मन्त्र:9 | अष्टक:4» अध्याय:8» वर्ग:6» मन्त्र:4 | मण्डल:6» अनुवाक:4» मन्त्र:9


350 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्य किसका सेवन करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जो (अग्निः) पावक के समान वर्त्तमान (विभावा) विशेषता से प्रकाशमान (होता) दानशील जन (त्वष्टारम्) छेदन-भेदन करनेवाले (सुहवम्) बुलाने योग्य वा (पस्त्यानाम्) घरों के बीच (यजतम्) सङ्ग करने योग्य वा (ऋभ्वम्) बुद्धिमान् (सुगभस्तिम्) सुन्दर प्रकाशक (प्रथमभाजम्) अगलों को सेवते हुए (यशसम्) कीर्त्तिमान् तथा (वयोधाम्) जीवन धारण करनेवाले तथा (सुपाणिम्) सुन्दर व्यवहारवाले वा शोभन धर्म कर्मकारी हस्त जिसके उस (देवम्) दान करनेवाले विद्वान् जन का (यक्षत्) सङ्ग करे, वही तुमको सङ्ग करने योग्य है ॥९॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्यावृद्ध, अग्नि के समान अविद्याजन्य दुःख के जलानेवाले विद्वानों की सेवा करते हैं, वे घर में दीपक के समान उपदेश देने योग्यों को आत्माओं के प्रकाश करने को योग्य हैं ॥९॥
350 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

होता-अग्नि-विभावा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (होता) = दानपूर्वक अदन करनेवाला व्यक्ति (ऋभ्वम्) = [उरु भासमानम्] खूब (दीस देवम्) = प्रकाशमय प्रभु को यक्षत् = पूजित करता है, जो प्रभु (प्रथमभाजम्) = प्रथम स्थान का सेवन करनेवाले हैं, सब ज्ञान शक्ति आदि गुणों के दृष्टिकोण से प्रथम स्थान में स्थित हैं। (यशसम्) = यशस्वी हैं । (वयोधाम्) = उपासकों के लिये उत्कृष्ट जीवन का धारण करनेवाले हैं। (सुपाणिम्) = उत्तम हाथों व कर्मोंवाले हैं और (सुगभस्तिम्) = उत्तम ज्ञानरश्मियोंवाले हैं। [२] (अग्नि:) = प्रगतिशील, विभावाविशिष्ट दीप्तिवाला पुरुष (पस्त्यानां यजतम्) = सब गृहवासियों के पूज्य, (सुहवम्) = सुगमता से पुकारने योग्य (त्वष्टारम्) = उस निर्माता प्रभु को [यक्षत्] पूजता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम 'दानपूर्वक अदन करनेवाले, प्रगतिशील व विशिष्ट दीप्तिवाले' बनकर ही प्रभु करते हैं। यह उपासना हमें 'अग्रणी-यशस्वीजीवनवाला - कार्यकुशल- ज्ञानरश्मि का उपासन -उत्कृष्ट सम्पन्न' बनाता है ।
350 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्याः कं सेवेरन्नित्याह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! योऽग्निरिव विभावा होता त्वष्टारं सुहवं पस्त्यानां मध्ये यजतमृभ्वं सुगभस्तिं प्रथमभाजं यशसं वयोधां सुपाणिं देवं यक्षत्स एव युष्माभिः सङ्गन्तव्यः ॥९॥

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रथमभाजम्) यः प्रथमान् भजति सेवते (यशसम्) यशः कीर्तिर्विद्यते यस्य तम् (वयोधाम्) यो वयो जीवनं दधाति तम् (सुपाणिम्) शोभनौ धर्मकर्मकरौ पाणी श्रेष्ठो व्यवहारो वा यस्य तम् (देवम्) दातारं विद्वांसम् (सुगभस्तिम्) सुष्ठुप्रकाशम् (ऋभ्वम्) मेधाविनम् (होता) दाता (यक्षत्) सङ्गच्छेत् (यजतम्) सङ्गन्तव्यम् (पस्त्यानाम्) गृहाणाम् (अग्निः) पावक इव वर्त्तमानः (त्वष्टारम्) छेत्तारम् (सुहवम्) सुष्ठ्वाह्वयितुं योग्यम् (विभावा) यो विशेषेण भाति ॥९॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये मनुष्या विद्यावृद्धान् पावकवदविद्यादुःखदाहकान् विदुषः सेवन्ते ते गृहे दीप इवोपदेश्यानामात्मनः प्रकाशयितुमर्हन्ति ॥९॥
350 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let agni, generous yajaka, join and offer abundant homage and service to Tvashta, maker of forms and institutions for humanity. Who is freely sociable, and first to be invited, famous and adorable, giver of health and long age, expert of hand in action, generous, brilliant, exceptionally intelligent, adorable and openly accessible and responsive to the brilliant host, agni.
350 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Whom should men serve-is further told.

अन्वय:

O men! you should associate with that man, who, being a liberal donor and shining like fire, worships an enlightened person, who is destroyer of evils, to be invited well, worthy of association, living at the houses of his pupils, genius, endowed with good light of knowledge, serving exalted wisemen, glorious, doer of good deeds with his hands or a man of noble dealings and a highly learned person, who gives knowledge to others.

भावार्थभाषाः - Those men, who serve persons of advanced knowledge and burners (destroyers) of ignorance and miseries like fire, can illuminate the souls of their audience like a lamp in the house.
350 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जी माणसे विद्यावृद्ध अविद्यायुक्त दुःखाचे दहन करणाऱ्या अग्नीप्रमाणे विद्वानांची सेवा करतात ती घरात जसा दीपक तसे उपदेश करण्यायोग्य आत्म्यामध्ये प्रकाश करण्यायोग्य असतात. ॥ ९ ॥