त्वामिद्धि हवा॑महे सा॒ता वाज॑स्य का॒रवः॑। त्वां वृ॒त्रेष्वि॑न्द्र॒ सत्प॑तिं॒ नर॒स्त्वां काष्ठा॒स्वर्व॑तः ॥१॥
tvām id dhi havāmahe sātā vājasya kāravaḥ | tvāṁ vṛtreṣv indra satpatiṁ naras tvāṁ kāṣṭhāsv arvataḥ ||
त्वाम्। इत्। हि। हवा॑महे। सा॒ता। वाज॑स्य। का॒रवः॑। त्वाम्। वृ॒त्रेषु॑। इ॒न्द्र॒। सत्ऽप॑तिम्। नरः॑। त्वाम्। काष्ठा॑सु। अर्व॑तः ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब चौदह ऋचावाले छयालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर शिल्पविद्या को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु के आराधन के लाभ
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ पुनः शिल्पविद्यामाह ॥
हे इन्द्र ! कारवो नरो वयं त्वां हि वाजस्य साता हवामहे वृत्रेषु सत्पतिं त्वां हवामहेऽर्वतः सारथिरिव त्वां काष्ठास्विद्धवामहे ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
"Something about technology-is told.
O wealthy person ! we artists and artisans call you on the occasion of the division (proper utilization or application) of the scientific knowledge. We call on you, who are a good master on earning wealth. Like a charioteer for his horses, we call on you in all directions.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात राजा, वीर, युद्ध, गृह, शूरवीर व यान यांच्या कृत्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.
