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त्वां हि म॒न्द्रत॑ममर्कशो॒कैर्व॑वृ॒महे॒ महि॑ नः॒ श्रोष्य॑ग्ने। इन्द्रं॒ न त्वा॒ शव॑सा दे॒वता॑ वा॒युं पृ॑णन्ति॒ राध॑सा॒ नृत॑माः ॥७॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvāṁ hi mandratamam arkaśokair vavṛmahe mahi naḥ śroṣy agne | indraṁ na tvā śavasā devatā vāyum pṛṇanti rādhasā nṛtamāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वाम्। हि। म॒न्द्रऽत॑मम्। अ॒र्क॒ऽशो॒कैः। व॒वृ॒महे॑। महि॑। नः॒। श्रोषि॑। अ॒ग्ने॒। इन्द्र॑म्। न। त्वा॒। शव॑सा। दे॒वता॑। वा॒युम्। पृ॒ण॒न्ति॒। राध॑सा। नृऽत॑माः ॥७॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:4» मन्त्र:7 | अष्टक:4» अध्याय:5» वर्ग:6» मन्त्र:2 | मण्डल:6» अनुवाक:1» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अन्नादि देनेवाले प्रशंसनीय होते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान जो आप (नः) हम लोगों के (महि) बड़े वचन को (श्रोषि) सुनते हैं उन (अर्कशोकैः) अन्न आदिकों के शोधनों से (मन्द्रतमम्) अत्यन्त आनन्द देनेवाले (त्वाम्) आप का हम लोग (ववृमहे) स्वीकार करते हैं और हे (नृतमाः) अत्यन्त अग्रणी जनो ! आप लोग (हि) जिस कारण से जैसे (देवता) जगदीश्वर सम्पूर्ण जगत् को प्रसन्न करता है, वैसे (शवसा) बल और (राधसा) धन से (वायुम्) प्राण आदि को (पृणन्ति) सुखी करते हैं उन (त्वा)आपको (इन्द्रम्) बिजुली को (न) जैसे वैसे हम लोग स्वीकार करते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो अन्नादिकों से अत्यन्त आनन्द देनेवाले, मनुष्यों में उत्तम मनुष्य, सम्पूर्ण संसार को उत्तम बुद्धियुक्त करते हैं, वे सत्कार करने के योग्य होते हैं ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शवसा - देवता - राधसा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अर्कशोकै:) = पूजा की साधनभूत ज्ञानदीप्तियों से हम (त्वाम्) = आपका (हि) = निश्चय से ववृमहे वरण करते हैं। जो आप (मन्द्रतमम्) अत्यन्त आनन्दमय व स्तुति के योग्य हैं। हे (अग्ने) = परमात्मन् ! आप (नः) = हमें (महि श्रोषि) = खूब ही ज्ञान का श्रवण कराइये। आप से ज्ञान को प्राप्त करके ही हम आपकी ओर झुकाववाले होते हैं। [२] (नृतमा:) = अपने को उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले लोग इन्द्रं न ऐश्वर्यशाली के समान ही वायुम् गतिशील आपको (शवसा) = शक्ति से (देवता) = दिव्यगुणों से तथा (राधसा) = संसिद्धि से, योगसाधना में प्राप्त होनेवाली सिद्धियों के द्वारा (पृणन्ति) = प्रीणित करते हैं। प्रभु सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के स्वामी हैं तथा स्वाभाविक रूप से ही जीव हित के लिये क्रियाओं को करनेवाले हैं। इस प्रभु का आराधन जीव इस प्रकार कर सकता है कि वह[क] अपने अन्दर बल का सम्पादन करे [शवसा], [ख] दिव्यगुणों को धारण करे [देवता] तथा [ग] योगमार्ग पर आगे बढ़ता हुआ सिद्धि को प्राप्त करे [राधसा]।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु की उपासना पूजा की साधनभूत ज्ञानदीप्तियों से होती है, प्रभु का आराधक अपने को सबल बनाता है, दिव्यगुणों को धारण करता है और योगमार्ग पर आगे बढ़ता हुआ सिद्धियों को प्राप्त करता है [उनमें फँसता नहीं] ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अन्नादिदानाः प्रशंसनीयाः स्युरित्याह ॥

अन्वय:

हे अग्ने ! यस्त्वं नो महि वचः श्रोषि तमर्कशोकैर्मन्द्रतमं त्वां वयं ववृमहे। हे नृतमा ! भवन्तो हि यथा देवता सर्वं जगत्पृणाति तथा शवसा राधसा वायुं पृणान्ति तं त्वेन्द्रं न वयं ववृमहे ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वाम्) (हि) यतः (मन्द्रतमम्) अतिशयेनानन्दकरम् (अर्कशोकैः) अन्नादीनां शोधनैः (ववृमहे) स्वीकुर्म्महे (महि) महत् (नः) अस्माकम् (श्रोषि) शृणोषि (अग्ने) पावक इव वर्त्तमान (इन्द्रम्) विद्युतम् (न) इव (त्वा) त्वाम् (शवसा) बलेन (देवता) जगदीश्वरः (वायुम्) प्राणादिकम् (पृणन्ति) सुखयन्ति (राधसा) धनेन (नृतमाः) अतिशयेन नायकाः ॥७॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः । येऽन्नादिभिः परमानन्दप्रदातारो नरेषूत्तमाः सर्वं जगद्बोधयन्ति ते सत्कर्त्तव्या भवन्ति ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord most charming and blissful, with brilliant songs of adoration we celebrate you. Listen to our song of sublimity. Like Indra, lord of omnipotence, like Vayu, breath of life, the best of leading lights of humanity adore you with all their might and sense of fulfilment.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

In the praise of donors of food and other things.

अन्वय:

O enlightened person ! purify like the fire, as you listen to our great request. We accept the vast ghee as the giver of delight by the purification of food and other means. O the best leaders! as God gladdens the whole world, so you make Prana and others happy, with your strength and wealth. We accept you like electricity.

भावार्थभाषाः - Those who are the best among men enlightened persons with good food and other things and are givers of the best bliss are worthy of respect.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. अन्न इत्यादींनी आनंद देणारी उत्तम माणसे संपूर्ण जगाला उत्तम बुद्धिमान बनवितात, ती सत्कार करण्यायोग्य असतात. ॥ ७ ॥