यथा॑ होत॒र्मनु॑षो दे॒वता॑ता य॒ज्ञेभिः॑ सूनो सहसो॒ यजा॑सि। ए॒वा नो॑ अ॒द्य स॑म॒ना स॑मा॒नानु॒शन्न॑ग्न उश॒तो य॑क्षि दे॒वान् ॥१॥
yathā hotar manuṣo devatātā yajñebhiḥ sūno sahaso yajāsi | evā no adya samanā samānān uśann agna uśato yakṣi devān ||
यथा॑। हो॒तः॒। मनु॑षः। दे॒वऽता॑ता। य॒ज्ञेभिः॑। सू॒नो॒ इति॑। स॒ह॒सः॒। यजा॑सि। ए॒व। नः॒। अ॒द्य। स॒म॒ना। स॒मा॒नान्। उ॒शन्। अ॒ग्ने॒। उ॒श॒तः। य॒क्षि॒। दे॒वान् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब आठ ऋचावाले चौथे सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
देव सम्पर्क से देव बनना
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
हे सहसः सूनो होतरुशन्नग्ने ! यथा मनुषो यज्ञेभिर्देवताता यजासि तथा त्वमद्य समानानुशतो नोऽस्मान् देवान् समनैवा यक्षि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should men do is told.
O liberal donor! desiring the welfare of all, you are the son of a mighty and enlightened person who purifies like the fire. You being a thoughtful man, perform the Yajna (divine-non-violent sacrifice) with all requisite means and implements. So be united with us who are desirous of doing good to others and are learned and consequently equal or agreeable to you in battles.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नी, ईश्वर व विद्वान यांचे गुणवर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
