उद॑ग्ने भारत द्यु॒मदज॑स्रेण॒ दवि॑द्युतत्। शोचा॒ वि भा॑ह्यजर ॥४५॥
ud agne bhārata dyumad ajasreṇa davidyutat | śocā vi bhāhy ajara ||
उत्। अ॒ग्ने॒। भा॒र॒त॒। द्यु॒ऽमत्। अज॑स्रेण। दवि॑द्युतत्। शोच॑। वि। भा॒हि॒। अ॒ज॒र॒ ॥४५॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दीप्त प्रभु हमें भी दीप्त करें
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
हे भारताजराग्ने ! भवानजस्रेण द्युमद्दविद्युतत् तदर्थं त्वमुच्छोचा वि भाहि ॥४५॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should men do iș again told.
O upholder of noble virtues ! enlightened person free from the defects of old age, (energetic) and un-decaying, you illuminate constantly. Therefore shine forth and glean with the light of knowledge.
