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अच्छा॑ नो या॒ह्या व॑हा॒भि प्रयां॑सि वी॒तये॑। आ दे॒वान्त्सोम॑पीतये ॥४४॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

acchā no yāhy ā vahābhi prayāṁsi vītaye | ā devān somapītaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अच्छ॑। नः॒। या॒हि॒। आ। व॒ह॒। अ॒भि। प्रयां॑सि। वी॒तये॑। आ। दे॒वान्। सोम॑ऽपीतये ॥४४॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:16» मन्त्र:44 | अष्टक:4» अध्याय:5» वर्ग:29» मन्त्र:4 | मण्डल:6» अनुवाक:2» मन्त्र:44


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्यों को किसका सत्कार करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वन् ! आप (नः) हम लोगों को (अच्छा) उत्तम प्रकार (सोमपीतये) सोमलतारूप ओषधि के रस के पान के लिये (आ, याहि) सब ओर से प्राप्त होओ और (प्रयांसि) अत्यन्त प्रिय वस्तुओं को (अभि) चारों ओर से (आ) सब प्रकार (वह) प्राप्त होओ और (वीतये) ज्ञान के लिये (देवान्) विद्वानों को सब ओर से प्राप्त होओ ॥४४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि सत्कार के लिये विद्वानों का आह्वान करें ॥४४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वीतये, सोमपीतये

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (नः अच्छा) = हमारी ओर (आयाहि) = हमें आभिमुख्येन प्राप्त होइये । हमें (प्रयांसि अभिः) = सात्त्विक अन्नों की ओर (आवह) = ले चलिए। हम सात्त्विक अन्नों का ही सेवन करें। (वीतये) = अज्ञानान्धकार के ध्वंस के लिये यह सात्त्विक अन्नों का सेवन आवश्यक ही है 'आहार शुद्धौ सत्त्वशुद्धिः ' । [२] हमें (देवान् आ) = दिव्यगुणों को प्राप्त कराइये जिससे हम (सोमपीतये) = सोम का शरीर में पान कर सकें। शरीर में सोम का रक्षण आवश्यक ही है। और यह रक्षण तभी होता है जब हम आसुरभावों से दूर हों और दैवीवृत्तियों के समीप हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का उपासन करें, सात्त्विक अन्नों का सेवन करें जिससे अज्ञानान्धकार का ध्वंस हो। अपने अन्दर दिव्य गुणों का धारण करते हुये आसुरभावों से ऊपर उठें जिससे सोम का [वीर्य का] रक्षण कर सकें।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्यैः केषां सत्कारः कर्त्तव्य इत्याह ॥

अन्वय:

हे विद्वंस्त्वन्नोऽच्छा सोमपीतय आ याहि। प्रयांस्यभ्याऽऽवह वीतये देवानाऽऽयाहि ॥४४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अच्छा) अत्र संहितायामिति दीर्घः। (नः) अस्मान् (याहि) प्राप्नुहि (आ) (वह) प्राप्नुहि (अभि) (प्रयांसि) प्रियतमानि (वीतये) ज्ञानाय (आ) समन्तात् (देवान्) विदुषः (सोमपीतये) सोमस्य पानाय ॥४४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैः सत्काराय विदुषामाह्वानं कर्त्तव्यम् ॥४४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, leading light of knowledge, generous pioneer, come fast in all your glory, bring us the dearest powers for sustenance and advancement for the sake of peace and well-being, and bring the noble brilliancies along to celebrate success with the delight of soma.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Who should be honored by men is told.

अन्वय:

O highly learned person! come to us, to drink the draught of Soma juice, obtain from all sides the most desirable or dearest articles. Approach the enlightened person, for the attainment of knowledge.

भावार्थभाषाः - Men should invite the enlightened person to show them respect.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी सत्कारासाठी विद्वानांना आवाहन करावे. ॥ ४४ ॥