आ जा॒तं जा॒तवे॑दसि प्रि॒यं शि॑शी॒ताति॑थिम्। स्यो॒न आ गृ॒हप॑तिम् ॥४२॥
ā jātaṁ jātavedasi priyaṁ śiśītātithim | syona ā gṛhapatim ||
आ। जा॒तम्। जा॒तऽवे॑दसि। प्रि॒यम्। शि॒शी॒त॒। अति॑थिम्। स्यो॒ने। आ। गृ॒हऽप॑तिम् ॥४२॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
विद्वानों को चाहिये कि श्रेष्ठ गृहस्थों का सत्कार करें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु को हृदय में स्थापित करना
स्वामी दयानन्द सरस्वती
विद्वद्भिः सद्गृहस्थाः सत्कर्त्तव्या इत्याह ॥
हे विद्वांसो ! जातवेदस्याऽऽजातं प्रियमतिथिमिव स्योने गृहपतिमा शिशीत ॥४२॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
Good householders should be honored by the learned persons is told.
O learned persons ! honor a house- holder who is well known among the knowers of various sciences and is venerable like a dear guest. Honor him to your home.
