उप॑ त्वा र॒ण्वसं॑दृशं॒ प्रय॑स्वन्तः सहस्कृत। अग्ने॑ ससृ॒ज्महे॒ गिरः॑ ॥३७॥
upa tvā raṇvasaṁdṛśam prayasvantaḥ sahaskṛta | agne sasṛjmahe giraḥ ||
उप॑। त्वा॒। र॒ण्वऽस॑न्दृशम्। प्रय॑स्वन्तः। स॒हः॒ऽकृ॒त॒। अग्ने॑। स॒सृ॒ज्महे॑। गिरः॑ ॥३७॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
मनुष्य कैसे वाणी को प्रयुक्त करें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'रण्वसन्द्वक्' प्रभु
स्वामी दयानन्द सरस्वती
मनुष्यैः कीदृशी वाक् प्रयोक्तव्येत्याह ॥
हे सहस्कृताग्ने ! प्रयस्वन्तो वयं या गिरः ससृज्महे ताभी रण्वसन्दृशं त्वोप ससृज्महे ॥३७॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What kind of speech should be used by men is told.
O enlightened person! purifier like the fire, as we being industrious use good speeches for our purposes, so let us always manifest such true and sweet words for you also whose look is lovely and who do things with energy.
