हि यो मानु॑षा यु॒गा सीद॒द्धोता॑ क॒विक्र॑तुः। दू॒तश्च॑ हव्य॒वाह॑नः ॥२३॥
sa hi yo mānuṣā yugā sīdad dhotā kavikratuḥ | dūtaś ca havyavāhanaḥ ||
सः। हि। यः। मानु॑षा। यु॒गा। सीद॑त्। होता॑। क॒विऽक्र॑तुः। दू॒तः। च॒। ह॒व्य॒ऽवाह॑नः ॥२३॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दूतः-हव्यवाहनः
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः सोऽग्निः कीदृशोऽस्तीत्याह ॥
यो हव्यवाहनो दूतश्चाग्निर्मानुषा युगा सीदत् स हि होता कविक्रतुरिव कार्य्यसाधको भवति ॥२३॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The nature of Agni is told further.
Agni (fire) which is the bearer of the oblations and is like a messenger (conveying smoke and fragrance of the oblation to distant places), is seated in every age. Like a great scholar, it is accomplisher of great works.
