न॒हि ते॑ पू॒र्तम॑क्षि॒पद्भुव॑न्नेमानां वसो। अथा॒ दुवो॑ वनवसे ॥१८॥
nahi te pūrtam akṣipad bhuvan nemānāṁ vaso | athā duvo vanavase ||
न॒हि। ते॒। पू॒र्त्तम्। अ॒क्षि॒ऽपत्। भुव॑त्। ने॒मा॒ना॒म्। व॒सो॒ इति॑। अथ॑। दुवः॑। व॒न॒व॒से॒ ॥१८॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
मनुष्यों की किस प्रकार से इच्छा सिद्ध होती है, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु का पूरक तेज
स्वामी दयानन्द सरस्वती
मनुष्याणां कथमिच्छा सिध्यतीत्याह ॥
हे वसो ! ते नेमानां पूर्त्तं कश्चिदपि नह्यक्षिपत्। नहि भुवत्तस्मादथा दुवो वनवसे ॥१८॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How can man's desires be fulfilled is told.
O giver of shelter or supporter of others! none can throw away him who gives food and other things to the needy or deserving persons, none can overcome them. Accept our services.
