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न॒हि ते॑ पू॒र्तम॑क्षि॒पद्भुव॑न्नेमानां वसो। अथा॒ दुवो॑ वनवसे ॥१८॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nahi te pūrtam akṣipad bhuvan nemānāṁ vaso | athā duvo vanavase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न॒हि। ते॒। पू॒र्त्तम्। अ॒क्षि॒ऽपत्। भुव॑त्। ने॒मा॒ना॒म्। व॒सो॒ इति॑। अथ॑। दुवः॑। व॒न॒व॒से॒ ॥१८॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:16» मन्त्र:18 | अष्टक:4» अध्याय:5» वर्ग:24» मन्त्र:3 | मण्डल:6» अनुवाक:2» मन्त्र:18


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्यों की किस प्रकार से इच्छा सिद्ध होती है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (वसो) वसानेवाले (ते) आपके (नेमानाम्) अन्नों के (पूर्त्तम्) पूर्ण करनेवाले को मैं भी (नहि) नहीं (अक्षिपत्) फेंकता और नहीं (भुवत्) होवे, इससे (अथा) इसके अनन्तर (दुवः) सेवा को (वनवसे) स्वीकार करिये ॥१८॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य सत्य आचरण को करते हैं, उनकी कामना की पूर्ति कभी भी नहीं नष्ट की जाती है ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु का पूरक तेज

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (नेमानां वसो) = हम अधूरे, अल्पज्ञ व अल्पशक्तिमान् जीवों के (वसो) = वसानेवाले, हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले प्रभो ! (ते) = आपका (पूर्तम्) = हमारा पूरण करनेवाला तेज (अक्षिपत् नहि भुवत्) = हमारी आँखों को चुँधियानेवाला न हो। (अपितु) = आपका यह तेज हमारे दर्शन- सामर्थ्य को बढ़ानेवाला हो। [२] (अथा) = अब आपके तेज से कुछ पूर्णता को प्राप्त करने पर (दुव:) = हम से की गई परिचर्याओं व उपासनाओं को (वनवसे) = आप सेवन करनेवाले हों। अर्थात् हम आपके उपासक बन पायें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम अल्पज्ञ जीव प्रभु के तेज से अपने दर्शन- सामर्थ्य को बढ़ाकर, ठीक मार्ग पर चलते हुए, प्रभु के उपासक बनें।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्याणां कथमिच्छा सिध्यतीत्याह ॥

अन्वय:

हे वसो ! ते नेमानां पूर्त्तं कश्चिदपि नह्यक्षिपत्। नहि भुवत्तस्मादथा दुवो वनवसे ॥१८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (नहि) निषेधे (ते) तव (पूर्त्तम्) पूर्त्तिकरम् (अक्षिपत्) क्षिपति (भुवत्) भवेत् (नेमानाम्) अन्नानाम्। नेम इत्यन्ननाम। (निघं०२.७) (वसो) वासयितः (अथा) अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (दुवः) परिचरणम् (वनवसे) सम्भज ॥१८॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्याः सत्याचारं कुर्वन्ति तेषां कामपूर्तिं कदापि न हन्यते ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Never is the perfection, abundance and fruitfulness of your food and sustenance ever wasted away, instead it increases, O haven and home of life and creator of its sustenance. Hence accept our homage and reverence.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How can man's desires be fulfilled is told.

अन्वय:

O giver of shelter or supporter of others! none can throw away him who gives food and other things to the needy or deserving persons, none can overcome them. Accept our services.

भावार्थभाषाः - The noble desires of those persons are fulfilled (by God's grace) and they are not obstructed who always observe the rules of truthful conduct.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे सत्याचरणी असतात त्यांची कामनापूर्ती सदैव होते; ती कधी नष्ट होत नाही. ॥ १८ ॥