त्वम॑ग्ने य॒ज्ञानां॒ होता॒ विश्वे॑षां हि॒तः। दे॒वेभि॒र्मानु॑षे॒ जने॑ ॥१॥
tvam agne yajñānāṁ hotā viśveṣāṁ hitaḥ | devebhir mānuṣe jane ||
त्वम्। अ॒ग्ने॒। य॒ज्ञाना॑म्। होता॑। विश्वे॑षाम्। हि॒तः। दे॒वेभिः॑। मानु॑षे। जने॑ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अड़तालीस ऋचावाले सोलहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अब विद्वान् क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
हित: देवेभिर्मानुषे-जने
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ विद्वान् किं कुर्य्यादित्याह ॥
हे अग्ने ! यतस्त्वं यज्ञानां होता विश्वेषां हितोऽसि तस्माद्देवेभिर्मानुषे जनेप्रेरको भव ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should an enlightened person do is told.
O God! as You are the giver of all Yajnas (unifying noble acts) and are benevolent to all, therefore be impeller (inspirer) of all thougtful persons along with the enlightened men.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नी, विद्वान व ईश्वराचे गुणवर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
