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स त्वं दक्ष॑स्यावृ॒को वृ॒धो भू॑र॒र्यः पर॒स्यान्त॑रस्य॒ तरु॑षः। रा॒यः सू॑नो सहसो॒ मर्त्ये॒ष्वा छ॒र्दिर्य॑च्छ वी॒तह॑व्याय स॒प्रथो॑ भ॒रद्वा॑जाय स॒प्रथः॑ ॥३॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa tvaṁ dakṣasyāvṛko vṛdho bhūr aryaḥ parasyāntarasya taruṣaḥ | rāyaḥ sūno sahaso martyeṣv ā chardir yaccha vītahavyāya sapratho bharadvājāya saprathaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। त्वम्। दक्ष॑स्य। अ॒वृ॒कः। वृ॒धः। भूः॒। अ॒र्यः। पर॑स्य। अन्त॑रस्य। तरु॑षः। रा॒यः। सू॒नो॒ इति॑। स॒ह॒सः॒। मर्त्ये॑षु। आ। छ॒र्दिः। य॒च्छ॒। वी॒तऽह॑व्याय। स॒ऽप्रथः॑। भ॒रत्ऽवा॑जाय। स॒ऽप्रथः॑ ॥३॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:15» मन्त्र:3 | अष्टक:4» अध्याय:5» वर्ग:17» मन्त्र:3 | मण्डल:6» अनुवाक:1» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्य कैसे होवैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सहसः) बलवान् के (सूनो) सन्तान ! जो (त्वम्) आप (दक्षस्य) बल के (अवृकः) नहीं चोर (वृधः) बढ़ानेवाले (परस्य) अत्यन्त (अन्तरस्य) भिन्न (तरुषः) तारनेवाले (रायः) धन के (अर्यः) स्वामी (मर्त्येषु) मनुष्यों में (सप्रथः) तुल्य प्रसिद्धिवाले (वीतहव्याय) प्राप्त हुआ प्राप्त होने योग्य जिसको उस (भरद्वाजाय) धारण किया विज्ञान जिसने उसके लिये दाता (भूः) होओ (सः) वह (सप्रथः) विस्तृत विज्ञान के सहित आप (छर्दिः) गृह को (आ, यच्छ) आदान कीजिये अर्थात् लीजिये ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य सब प्रकार से बल के वृद्धि करें तो लक्ष्मीयुक्त कैसे न हों ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

परस्य आन्तरस्य अर्यः तरुषः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! (अवृक:) = [वर्कते आदत्ते] कुछ भी न लेनेवाले, एकदम लोभ से शून्य, (स त्वम्) = वे आप (दक्षस्य) = उन्नतिशील कार्यों को कुशलता से करनेवाले पुरुष के होते हैं। (परस्य) = बाह्य व (आन्तरस्य) = अन्दर के (अर्यः) = शत्रुओं के (तरुषः) = तरानेवाले होते हैं। द्वेष (वृधः भूः) = बढ़ानेवाले व विरोध करनेवाले लोग यदि हमारे बाह्य शत्रु हैं, तो रोग व वासनाएँ आन्तर शत्रु हैं, इन से आप उस दक्ष पुरुष को बचाते हैं। [२] हे (सहसः सूनो) = बल के पुञ्ज ! (सप्रथः) = अत्यन्त विस्तारवाले सर्वव्यापक प्रभो ! आप (मर्त्येषु) = मनुष्यों में (वीतहव्याय) = हव्य पवित्र सात्त्विक पदार्थों का ही भक्षण करनेवाले के लिये (रायः) = धनों को तथा (छर्दिः) = उत्तम गृह को (आयच्छ) = दीजिए। हे (सप्रथः) = सर्वतः पृथु प्रभो ! सर्वव्यापक प्रभो ! (भरद्वाजाय) = अपने में शक्ति का भरण करनेवाले के लिए धनों व उत्तम गृहों को दीजिए।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम कुशलता से कार्यों को करनेवाले बनें । प्रभु हमारा वर्धन करेंगे और हमें सब शत्रुओं से तरायेंगे। प्रभु ही 'वीतहव्य भरद्वाज' के लिये, सात्त्विक अन्नों का सेवन करनेवाले अपने में शक्ति को भरनेवाले पुरुष के लिये, धनों को व उत्तम गृह को देते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्याः कीदृशा भवेयुरित्याह ॥

अन्वय:

हे सहसस्सूनो ! यस्त्वं दक्षस्यावृको वृधः परस्यान्तरस्य तरुषो रायोऽर्यो मर्त्येषु सप्रथो वीतहव्याय भरद्वाजाय दाता भूः स सप्रथस्त्वं छर्दिराऽऽयच्छ ॥३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) (त्वम्) (दक्षस्य) बलस्य (अवृकः) अस्तेनः (वृधः) वर्धकः (भूः) भवेः (अर्य्यः) स्वामी (परस्य) प्रकृष्टस्य (अन्तरस्य) भिन्नस्य (तरुषः) तारकस्य (रायः) धनस्य (सूनो) अपत्य (सहसः) बलवतः (मर्त्येषु) मनुष्येषु (आ) समन्तात् (छर्दिः) गृहम् (यच्छ) देहि (वीतहव्याय) प्राप्तप्राप्तव्याय (सप्रथः) समानप्रख्यातिः (भरद्वाजाय) धृतविज्ञानाय (सप्रथः) विस्तृतविज्ञानेन सहितः ॥३॥
भावार्थभाषाः - यदि मनुष्याः सर्वतो बलं वर्धयेयुस्तर्हि श्रीमन्तः कथं न स्युः ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, child of omnipotence, leading light and giver of strength and courage, loving ruler free from jealousy and grabbing cruelty, be promoter of the efficient and the expert, be the master of external, internal and victorious power and honour, bring settlement, peace and comfort for the people, rise in expansion for the giver and receiver of yajnic creations, and honour the man of science and technology with recognition and advancement.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should men be is told.

अन्वय:

O son of the mighty person ! you are the honest multiplier of the wealth, you are the master of the wealth which is exalted, is different from wealth earned by unfair means and which take across all troubles. You are famous among mortals, are the giver to a man who has attained what was to be attained and to the upholder of knowledge. Being endowed with vast knowledge and wisdom, bestow a good and comfortable home to dwell.

भावार्थभाषाः - If men develop their power (physical, mental and spiritual), why should they not be wealthy and prosperous.
टिप्पणी: It is wrong on the part of Sayanacharya, Prof. Wilson, Griffith and others to take भरद्वाज and हघवीति as Proper Nouns instead of taking their derivative meanings as given above, as it is against the fundamental principals of the Vedic Terminology. आख्याप्रवचात्, परन्तु श्रुति सामान्यमात्रम् (मीमांसा संहिता) ।
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे सर्व प्रकारे बल वाढवितात ती धनवान का होणार नाहीत. ॥ ३ ॥