त्वद् विश्वा॑ सुभग॒ सौभ॑गा॒न्यग्ने॒ वि य॑न्ति व॒निनो॒ न व॒याः। श्रु॒ष्टी र॒यिर्वाजो॑ वृत्र॒तूर्ये॑ दि॒वो वृ॒ष्टिरीड्यो॑ री॒तिर॒पाम् ॥१॥
tvad viśvā subhaga saubhagāny agne vi yanti vanino na vayāḥ | śruṣṭī rayir vājo vṛtratūrye divo vṛṣṭir īḍyo rītir apām ||
त्वत्। विश्वा॑। सु॒ऽभ॒ग॒। सौभ॑गानि। अग्ने॑। वि। य॒न्ति॒। व॒निनः॑। न। व॒याः। श्रु॒ष्टी। र॒यिः। वाजः॑। वृ॒त्र॒ऽतूर्ये॑। दि॒वः। वृ॒ष्टिः। ईड्यः॑। री॒तिः। अ॒पाम् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर राजा से क्या प्राप्त होता है, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'सौभाग्य स्रोत' प्रभु
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्नृपात् किं प्राप्नोतीत्याह ॥
हे सुभगाऽग्ने राजन् ! वनिनो वया न जनास्त्वद्विश्वा सौभगानि वि यन्ति वृत्रतूर्य्ये दिवोऽपां वृष्टिरिव रीतिरीड्यो रयिर्वाजश्च श्रुष्टी यन्ति तस्माद्भवान्त्सत्कर्त्तव्यो भवति ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
In what way, a king can be good is told.
O prosperous and auspicious king! you are full of splendor like the fire, like the birds of the forest. The men obtain all riches and prosperity from you. Like the flow of water from the firmament, the admirable wealth which enables men to go from place to place for (trading and self-sufficiency in. Ed.) food materials are obtained from you in the battles. Therefore, you are worthy of respect.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नी, विद्वान व राजाचे गुणवर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
