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आ यस्मि॒न्त्वे स्वपा॑के यजत्र॒ यक्ष॑द्राजन्त्स॒र्वता॑तेव॒ नु द्यौः। त्रि॒ष॒धस्थ॑स्तत॒रुषो॒ न जंहो॑ ह॒व्या म॒घानि॒ मानु॑षा॒ यज॑ध्यै ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā yasmin tve sv apāke yajatra yakṣad rājan sarvatāteva nu dyauḥ | triṣadhasthas tataruṣo na jaṁho havyā maghāni mānuṣā yajadhyai ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। यस्मि॑न्। त्वे इति॑। सु। अपा॑के। य॒ज॒त्र॒। यक्ष॑त्। रा॒ज॒न्। स॒र्वता॑ताऽइव। नु। द्यौः। त्रि॒ऽस॒धस्थः॑। त॒त॒रुषः॑। न। जंहः॑। ह॒व्या। म॒घानि॑। मानु॑षा। यज॑ध्यै ॥२॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:12» मन्त्र:2 | अष्टक:4» अध्याय:5» वर्ग:14» मन्त्र:2 | मण्डल:6» अनुवाक:1» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (यजत्र) मेल करने योग्य (राजन्) राजा ! (यस्मिन्) जिन (अपाके) बुद्धि के परिपाक अर्थात् पूर्णता से रहित (त्वे) आप में (सर्वतातेव) सब की वृद्धि करनेवाला यज्ञ जैसे वैसे (द्यौः) बिजुली आदि का प्रकाश (सु) उत्तम प्रकार (आ, यक्षत्) सब ओर से मेल करे वह आप (नु) शीघ्र (त्रिषधस्थः) तीन पृथिवी, अन्तरिक्ष और सूर्य्यलोक में तुल्य स्थान में वर्त्तमान (ततरुषः) तारने और (जंहः) शीघ्र चलनेवाला (न) जैसे वैसे (हव्या) देने और ग्रहण करने योग्य (मानुषा) मनुष्य सम्बन्धी (मघानि) धनों को (यजध्यै) प्राप्त होने को यजन कीजिये ॥२॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जहाँ सूर्य्य के सदृश प्रतापी राजा होता है, वहाँ सम्पूर्ण सुख होते हैं ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्रिषधस्थ प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (यजत्र) = पूजनीय (राजन्) = देदीप्यमान प्रभो ! (यस्मिन्) = जिन (सु अपाके) = [अपक्तव्यप्रज्ञ] पूर्ण प्रज्ञ (त्वे) = आप में (नु) = अब (सर्वताता इव) = सर्वत्र विस्तृत - सा (द्यौः) = यह आकाश (यक्षत्) = संगत होता है, अर्थात् आप आकाश की तरह व्यापक हैं, 'खं ब्रह्म' हैं । वस्तुतः आप ही आकाश हैं, आप ही तो सर्वाधार हैं। [२] वे आप (त्रिषधस्थः) ='पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्युलोक' इन तीनों स्थानों में सहस्थित हैं। (ततरुषः न) = इस आकाश को तीर्ण करनेवाले सूर्य के समान, आप (मानुषा) = मानव हितकारी (हव्या) = पुकारने योग्य, प्रार्थनीय अथवा (हव्य) = यज्ञिय पवित्र (मघानि) = ऐश्वर्यों को (यजध्यै) = हमारे साथ संगत करने के लिये, (जंहः) = वेगवान् होइये। आप शीघ्रता से इन हव्य पदार्थों को हमें प्राप्त कराइये ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हे प्रभो ! आकाशवत् सर्वव्यापक हैं, तीनों लोकों में सहस्थित हैं। आप हमें शीघ्रता से हव्य पदार्थों को प्राप्त कराने के लिये होइये। इन पदार्थों को साधन बनाकर हम 'मस्तिष्क, मन व शरीर' तीनों लोकों की समानरूप से उन्नति करते हुए 'त्रिषधस्थ' बने ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥

अन्वय:

हे यजत्र राजन् ! यस्मिन्नपाके त्वे सर्वतातेव द्यौः स्वाऽऽयक्षत् स भवान्नु त्रिषधस्थस्ततरुषो जंहो न हव्या मानुषा मघानि यजध्यै यक्षत् ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आ) समन्तात् (यस्मिन्) (त्वे) त्वयि (सु) (अपाके) अपरिपक्वे (यजत्र) सङ्गन्तुमर्ह (यक्षत्) यजेत् (राजन्) (सर्वतातेव) सर्वेषां वर्धको यज्ञ इव (नु) सद्यः (द्यौः) विद्युदादिप्रकाशः (त्रिषधस्थः) त्रिषु भूम्यन्तरिक्षसूर्य्यलोकेषु त्रिविधेषु समानस्थानेषु वर्त्तमानः (ततरुषः) तारकः (न) इव (जंहः) सद्यो गन्ता (हव्या) आदातुं दातुमर्हाणि (मघानि) धनानि (मानुषा) मनुष्याणामिमानि (यजध्यै) सङ्गन्तुम् ॥२॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यत्र सूर्य्यवद्राजा प्रतापी भवति तत्र सर्वाणि सुखानि जायन्ते ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, adorable self-refulgent ruling power of life and yajna, let the light of the sun join your radiance as in yajna for universal good so that the light pervasive in heaven, firmament and earth like a dynamic saving power of vitality may create and develop means and materials for wealth and prosperity, honour and excellence for humanity.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The men's duties are highlighted.

अन्वय:

O king ! you are worthy of association. In you who are not yet perfectly mature in knowledge (but desire to do so), the light ( knowledge. Ed.) of electricity etc. is united like the Yajna which is the cause of the advancement of all Like the air present on earth, firmament and the solar world which is remover of many diseases while blowing on in pure places, perform Yajna for uniting the riches that are worth taking and giving, urging others also to emulate the same.

भावार्थभाषाः - Where the king is mighty like the sun, resides all happiness.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जेथे सूर्याप्रमाणे पराक्रमी राजा असतो तेथे संपूर्ण सुख मिळते. ॥ २ ॥