वांछित मन्त्र चुनें
419 बार पढ़ा गया

उ॒त स्म॒ यं शिशुं॑ यथा॒ नवं॒ जनि॑ष्टा॒रणी॑। ध॒र्तारं॒ मानु॑षीणां वि॒शाम॒ग्निं स्व॑ध्व॒रम् ॥३॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta sma yaṁ śiśuṁ yathā navaṁ janiṣṭāraṇī | dhartāram mānuṣīṇāṁ viśām agniṁ svadhvaram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त। स्म॒। यम्। शिशु॑म्। य॒था॒। नव॑म्। जनि॑ष्ट। अ॒रणी॒ इति॑। ध॒र्तार॑म्। मानु॑षीणाम्। वि॒शाम्। अ॒ग्निम्। सु॒ऽअ॒ध्व॒रम् ॥३॥

419 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:9» मन्त्र:3 | अष्टक:4» अध्याय:1» वर्ग:1» मन्त्र:3 | मण्डल:5» अनुवाक:1» मन्त्र:3


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर अग्निविषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे माता और पिता (नवम्) नवीन (शिशुम्) बालक को (जनिष्ट) उत्पन्न करते हैं, वैसे (स्म) ही (यम्) जिसको (अरणी) काष्ठविशेषों के सदृश (मानुषीणाम्) मनुष्य आदि (विशाम्) प्रजाओं के (धर्त्तारम्) धारण करनेवाले (उत) भी (स्वध्वरम्) उत्तम प्रकार अहिंसारूप धर्म को प्राप्त (अग्निम्) अग्नि को विद्वान् जन उत्पन्न करें ॥३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे माता-पिता श्रेष्ठ सन्तान को उत्पन्न करके सुख को प्राप्त होते हैं, वैसे विद्वान् जन बिजुलीरूप अग्नि को उत्पन्न करके ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दो अरणियों द्वारा प्रभु रूप अग्नि का प्रकाश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उत) = और उपर्युक्त मन्त्र में वर्णित घरों में रहकर, हम उस परमात्मा की उपासना करें, (यम्) = जिसको (अरणी) = देह व प्रणवरूप अरणियाँ [स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं प्रोक्तारणिं ध्याननिर्मथनाभ्यासात् पश्येद्वेवं निगूढवत्] उसी प्रकार (जनिष्ट) = उत्पन्न करती हैं (यथा) = जैसे माता-पिता रूप अरणियाँ (नवं शिशुम्) = एक नव शिशु को। अथवा जैसे दो काष्ठरूप अरणियाँ इस स्तुत्य शिशु रूप अग्नि को [नु स्तुतौ] । प्रभु के प्रकाश को प्राप्त करने के लिये शरीर में स्वास्थ्य की सबलता आवश्यक है तथा हृदय में प्रभु के ध्यान की आवश्यकता है। [२] हम उस प्रभु का ध्यान करें जो कि (मानुषीणां विशाम्) = मानव प्रजाओं के (धर्तारम्) = धारण करनेवाले हैं। (अग्निम्) = आगे ले चलनेवाले हैं तथा (स्वध्वरम्) = हमारे जीवन से उत्तम यज्ञात्मक कर्मों को करानेवाले हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शक्ति व ध्यान के द्वारा हम प्रभु के प्रकाश को प्राप्त करें। वे प्रभु पोषक अग्रणी व उत्तम यज्ञादि को प्राप्त करानेवाले हैं।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरग्निविषयमाह ॥

अन्वय:

यथा मातापितरौ नवं शिशुं जनिष्ट तथा स्म यमरणी मानुषीणां विशां धर्त्तारमुत स्वध्वरमग्निं विद्वांसो जनयन्तु ॥३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) अपि (स्म) (यम्) (शिशुम्) बालकम् (यथा) (नवम्) नवीनम् (जनिष्ट) जनयतः (अरणी) काष्ठविशेषाविव (धर्त्तारम्) (मानुषीणाम्) मनुष्यादीनाम् (विशाम्) प्रजानाम् (अग्निम्) (स्वधरम्) सुष्ठ्वहिंसाधर्मं प्राप्तम् ॥३॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथा मातापितरौ श्रेष्ठं सन्तानं जनयित्वा सुखमाप्नुतस्तथा विद्वांसो विद्युतमग्निमुत्पाद्यैश्वर्य्यमाप्नुवन्ति ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And just as two arani woods produce the fire, and just as mother and father beget and nurse a new bom baby, so do we kindle, raise and serve the holy fire of yajna and worship the lord of life, sustainer of human communities and high-priest of cosmic yajna.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of Agni ( energy/electricity) are told.

अन्वय:

The parents procreate new baby, likewise Agni (energy) is generated by attraction of two substances. Let learned persons generate Agni (energy) which upholds human beings and by which many (Yajnas) non-violent good acts are performed.

भावार्थभाषाः - There is a simile in the mantra. As parents enjoy happiness by giving birth to a good progeny, in the same manner, learned scientists become prosperous by tapping the resources of energy.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे माता-पिता श्रेष्ठ संतानांना जन्म देऊन सुखी होतात तसे विद्वान लोक विद्युतरूपी अग्नी उत्पन्न करून ऐश्वर्य प्राप्त करतात. ॥ ३ ॥