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अ॒ग्निर्होता॒ दास्व॑तः॒ क्षय॑स्य वृ॒क्तब॑र्हिषः। यं य॒ज्ञास॒श्चर॑न्ति॒ यं सं वाजा॑सः श्रव॒स्यवः॑ ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agnir hotā dāsvataḥ kṣayasya vṛktabarhiṣaḥ | saṁ yajñāsaś caranti yaṁ saṁ vājāsaḥ śravasyavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ग्निः। होता॑। दास्व॑तः। क्षय॑स्य। वृ॒क्तऽब॑र्हिषः। सम्। य॒ज्ञासः॑। चर॑न्ति। यम्। सम्। वाजा॑सः। श्रव॒स्यवः॑ ॥२॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:9» मन्त्र:2 | अष्टक:4» अध्याय:1» वर्ग:1» मन्त्र:2 | मण्डल:5» अनुवाक:1» मन्त्र:2


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब विद्वानों के गुणों को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् ! जैसे (होता) दाता (अग्निः) अग्नि के सदृश पुरुष (दास्वतः) देनेवाले के स्वभाव से युक्त (वृक्तबर्हिषः) जल से रहित (क्षयस्य) स्थान के मध्य में बसता है, वैसे (यम्) जिसको (श्रवस्यवः) अपने धन की इच्छा करनेवाले (वाजासः) वेग से युक्त (यज्ञासः) मिलने योग्य जन (सम्, चरन्ति) उत्तम प्रकार संचार करते हैं, वह (सम्) उत्तम प्रकार जनानेवाला होता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य बड़े अवकाशवाले गृहों को रच के पुरुषार्थ से पदार्थविद्या को प्राप्त हों ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'यज्ञासः वाजासः श्रवस्यवः' [कैसा घर ? ]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अग्निः) = वे अग्रणी प्रभु (दास्वतः) = [दसु उपक्षये] जिसमें से सब बुराइयों का उपक्षय कर दिया गया है अथवा [दास् दाने] दानवाले, जिसमें निरन्तर दान चलता है, (वृक्तबर्हिषः) = जिसमें से वासनाओं के बर्हि [घास] को काट दिया गया है, ऐसे वासनाशून्य (क्षयस्य) = गृह के (होता) = दाता हैं। प्रभु कृपा से हमारा घर दान की वृत्तिवाला व वासनाशून्य बनता है। [२] उस घर को प्रभु देते हैं (यम्) = जिसकी ओर (यज्ञासः) = यज्ञ (संचरन्ति) = गति करते हैं, (वाजास:) = शक्तियाँ (सम्) = गति करती हैं तथा (श्रवस्यवः) = ज्ञान की कामनावाले पुरुष गति करते हैं। इन गृहों के अन्दर रहनेवाले व्यक्ति शरीर में शक्ति-सम्पन्न [वाजास:] हृदयों में यज्ञ की भावनावाले [ यज्ञासः] तथा दीप्त मस्तिष्कवाले [श्रवस्यवः] होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु कृपा से हमारा घर वासनाओं से मलिन नहीं होता। यहाँ 'यज्ञों, शक्तियों व ज्ञानों' का निवास होता है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ विद्वद्गुणानाह ॥

अन्वय:

हे विद्वन् ! यथा होताग्निर्दास्वतो वृक्तबर्हिषः क्षयस्य मध्ये वसति तथा यं श्रवस्यवो वाजासो यज्ञासः सं चरन्ति स संज्ञापको भवति ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निः) पावक इव (होता) दाता (दास्वतः) दातृस्वभावस्य (क्षयस्य) निवासस्य (वृक्तबर्हिषः) वृक्तं वर्जितं बर्हिर्यस्मिन् (सम्) (यज्ञासः) सङ्गन्तव्याः (चरन्ति) (यम्) (सम्) (वाजासः) वेगवन्तः (श्रवस्यवः) आत्मनः श्रवमिच्छवः ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्या विस्तीर्णावकाशानि गृहाणि निर्माय पुरुषार्थेन पदार्थविद्यां प्राप्नुवन्तु ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni is the high-priest of Nature’s abundance for humanity, blessing the house of the liberal devotee ready to kindle the holy fire, since all nutriments, energies and all yajnic gifts of Divinity coexist and work with Agni.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of the enlightened persons are described.

अन्वय:

As a donor is purifier like fire and he lives in the middle and independent auspicious house, which is inhabited by men of charitable disposition. In the same manner, the man who is surrounded by shrewd and intelligent men, desires food and good reputation and is worthy of association, and thus becomes the enlightener of the people.

भावार्थभाषाः - Men should build spacious houses and acquire the knowledge of various articles.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी मोठमोठी घरे बांधून पुरुषार्थाने पदार्थविद्या प्राप्त करावी. ॥ २ ॥