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त्वाम॑ग्ने ह॒विष्म॑न्तो दे॒वं मर्ता॑स ईळते। मन्ये॑ त्वा जा॒तवे॑दसं॒ स ह॒व्या व॑क्ष्यानु॒षक् ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvām agne haviṣmanto devam martāsa īḻate | manye tvā jātavedasaṁ sa havyā vakṣy ānuṣak ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वाम्। अ॒ग्ने॒। ह॒विष्म॑न्तः। दे॒वम्। मर्ता॑सः। ई॒ळ॒ते॒। मन्ये॑। त्वा॒। जा॒तऽवे॑दसम्। सः। ह॒व्या। व॒क्षि॒। आ॒नु॒षक् ॥१॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:9» मन्त्र:1 | अष्टक:4» अध्याय:1» वर्ग:1» मन्त्र:1 | मण्डल:5» अनुवाक:1» मन्त्र:1


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब चतुर्थ अष्टक में सात ऋचावाले नवम सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्न्यादि पदार्थों के गुणों को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान जैसे (हविष्मन्तः) अच्छे दान आदि से युक्त (मर्त्तासः) मनुष्य (जातवेदसम्) उत्पन्न हुए पदार्थों को जाननेवाले (देवम्) प्रकाशमान अग्नि की प्रशंसा करते हैं, वैसे (त्वाम्) विद्वान् आपकी (ईळते) स्तुति करते हैं मैं जिन (त्वा) आप को (मन्ये) मानता हूँ (सः) वह आप (हव्या) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को (आनुषक्) अनुकूलता से (वक्षि) धारण करते हो ॥१॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो अग्नि आदि के गुणों को ढूँढ़ते हैं, वे ही विद्या के अनुकूल व्यवहारों को उत्पन्न करते हैं ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जातवेदस् प्रभु की उपासना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (देवं त्वाम्) = प्रकाशमय आपको (हविष्मन्त:) = हविवाले, दानपूर्वक अदन करनेवाले, यज्ञशेष का सेवन करनेवाले, (मर्तासः) = लोग (ईडते) = उपासित करते हैं। प्रभु की सच्ची उपासना वे ही करते हैं, जो कि हवि का सेवन करते हैं । [२] हे प्रभो ! मैं (त्वा) = आपको (जातवेदसम्) = सर्वज्ञ व सर्वैश्वर्यवाला [वेदस=धन] (मन्ये) = मानता हूँ । (सः) = वे आप (आनुषक्) = निरन्तर हव्या हव्य पदार्थों को वक्षि धारण करते हैं। हमारे लिये यज्ञ के साधनभूत सब पदार्थों को आप ही प्राप्त कराते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु सर्वज्ञ सर्वैश्वर्यवाले हैं। यज्ञशेष का सेवन करनेवाले लोग ही प्रभु के सच्चे उपासक हैं । इन हव्य पदार्थों को भी प्रभु ही तो प्राप्त कराते हैं ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाग्न्यादिगुणानाह ॥

अन्वय:

हे अग्ने ! यथा हविष्मन्तो मर्त्तासो जातवेदसं देवमग्निं प्रशंसन्ति तथा त्वामीळते। अहं यं त्वा मन्ये स त्वं हव्यानुषग्वक्षि ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वाम्) विद्वांसम् (अग्ने) पावक इव वर्त्तमान (हविष्मन्तः) प्रशस्तदानादियुक्ताः (देवम्) देदीप्यमानम् (मर्त्तासः) मनुष्याः (ईळते) स्तुवन्ति (मन्ये) (त्वा) त्वाम् (जातवेदसम्) (सः) (हव्या) होतुमर्हाणि (वक्षि) (आनुषक्) आनुकूल्येन ॥१॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । येऽग्न्यादिगुणानन्विच्छन्ति त एव विद्यानुकूलान् व्यवहारान् जनयन्ति ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - You, O fire divine, mortals bearing havis with reverence in homage, honour, celebrate and worship, and I meditate on your presence in omniscience to pray: Radiate the holy light and fragrance all round and let it come to me also, generous one.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of Agni ( energy) etc. are told.

अन्वय:

O learned person ! you are purifying like fire. The men of good charitable disposition praise the resplendent Agni, present in all embodied things, therefore they praise you. I know you well. You convey all oblations suitably.

भावार्थभाषाः - Those who seek after the properties of Agni (energy/electricity) and other elements, generate dealings in accordance with their knowledge.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात अग्नी व विद्वानाच्या गुणाचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे अग्नी इत्यादींच्या गुणात संशोधन करतात तेच विद्येच्या अनुकूल व्यवहार करतात. ॥ १ ॥