वांछित मन्त्र चुनें
414 बार पढ़ा गया

आ यस्ते॑ सर्पिरासु॒तेऽग्ने॒ शमस्ति॒ धाय॑से। ऐषु॑ द्यु॒म्नमु॒त श्रव॒ आ चि॒त्तं मर्त्ये॑षु धाः ॥९॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā yas te sarpirāsute gne śam asti dhāyase | aiṣu dyumnam uta śrava ā cittam martyeṣu dhāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। यः। ते॒। स॒र्पिः॒ऽआ॒सु॒ते॒। अग्ने॑। शम्। अस्ति॑। धाय॑से। आ। ए॒षु॒। द्यु॒म्नम्। उ॒त। श्रवः॑। आ। चि॒त्तम्। मर्त्ये॑षु। धाः॒ ॥९॥

414 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:7» मन्त्र:9 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:25» मन्त्र:4 | मण्डल:5» अनुवाक:1» मन्त्र:9


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अग्निशब्दार्थ विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) विद्वन् (यः) जो (धायसे) धारण करनेवाले के लिये (ते) आपका (सर्पिरासुते) घृतों से सब प्रकार उत्पन्न किये गये में (शम्) सुख (अस्ति) है उसको ग्रहण करता (एषु) इन (मर्त्येषु) मनुष्यों में (द्युम्नम्) यश वा धन को (आ, धाः) धारण करता (श्रवः) अन्न को (आ) धारण करता (उत) और (चित्तम्) संज्ञान को (आ) धारण करता है, उसके लिये आप ऐश्वर्य्य दीजिये ॥९॥
भावार्थभाषाः - जो कोई किसी के लिये विद्या धन और विज्ञान को धारण करता है तो उसके लिये उपकार किया भी पुरुष प्रत्युपकार के लिये वैसे ही सत्कार को करे ॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्योति-कीर्ति व स्मृति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (आसुते) = चतुर्दिक् ऐश्वर्यवाले (अग्ने) = परमात्मन् ! (यः) = जो (ते) = तेरा (सर्पि:) = [ उदकं नि० १ । १२] रेतः रूप उदक है, वह (आ) = शरीर में चारों ओर व्याप्त होता हुआ (शं अस्ति) = शान्ति को देनेवाला है तथा (धायसे) = धारण के लिये है। इस रेतः रूप उदक के शरीर में रक्षण से शरीर का धारण होता है और मानस शान्ति प्राप्त होती है । [२] (एषु) = इन इस सर्पि की रक्षा करनेवाले लोगों में (द्युम्नम्) = ज्ञान की ज्योति का (आधाः) = सर्वथा धारण करिये । (उत) = और इन (मर्त्येषु) = मनुष्यों में (श्रवः) = यश को धारण करिये। तथा (चित्रम्) = स्मृति शक्ति को (आधा:) = सर्वथा धारण करिये। ये लोग 'कोहं कुत आयातः' इस बात को भूले नहीं कि मैं 'कौन हूँ और क्यों कहाँ से आया हूँ' ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शरीर में सोमरक्षण से शरीर का धारण होता है, मन की शान्ति प्राप्त होती है । ज्योति, कीर्ति व स्मृति को हम प्राप्त करते हैं।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाग्निशब्दार्थविद्वद्विषयमाह ॥

अन्वय:

हे अग्ने ! यो धायसे ते सर्पिरासुते शमस्ति तद्धरत्येषु मर्त्येषु द्युम्नमा धाः श्रव आ धा उत चित्तमा धास्तस्मै त्वमैश्वर्यं देहि ॥९॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आ) (यः) (ते) तव (सर्पिरासुते) सर्पिभिः सर्वतो जनिते (अग्ने) विद्वन् (शम्) सुखम् (अस्ति) (धायसे) धात्रे (आ) (एषु) (द्युम्नम्) यशो धनं वा (उत) (श्रवः) अन्नम् (आ) (चित्तम्) संज्ञानम् (मर्त्येषु) (धाः) दधाति ॥९॥
भावार्थभाषाः - यदि कश्चित् कस्मैचिद्विद्यां धनं विज्ञानञ्च दधाति तर्हि तस्मा उपकृतोऽपि प्रत्युपकाराय तादृशमेव सत्कारं कुर्यात् ॥९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light, giver of peace and power, when the ghrta has been offered into the fire and the flames arise, then let there be a shower of peace for the bearer of oblations, your gift for the yajaka. O lord, bear and bring wealth of honour and excellence, food and energy, and a noble mind with wisdom and vision and vest the same in these dedicated people.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The duties of the enlightened persons are further mentioned.

अन्वय:

O learned leader, the man who takes delight in performance of the Yajna with ghee and other articles to those who are upholder of good virtues, give good reputation or wealth, good food and true unifying knowledge to him among the men.

भावार्थभाषाः - If a man gives knowledge, and physical and spiritual wealth to any men, then the person who is thus benefited should also mutually reciprocate and honor him doing good to him.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जर एखाद्याने एखाद्यासाठी विद्या व धन आणि विज्ञानाचा स्वीकार केला तर उपकारित पुरुषानेही प्रत्युपकारासाठी तसेच करावे. ॥ ९ ॥