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यं मर्त्यः॑ पुरु॒स्पृहं॑ वि॒दद्विश्व॑स्य॒ धाय॑से। प्र स्वाद॑नं पितू॒नामस्त॑तातिं चिदा॒यवे॑ ॥६॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yam martyaḥ puruspṛhaṁ vidad viśvasya dhāyase | pra svādanam pitūnām astatātiṁ cid āyave ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यम्। मर्त्यः॑। पु॒रु॒ऽस्पृह॑म्। वि॒दत्। विश्व॑स्य। धाय॑से। प्र। स्वाद॑नम्। पि॒तू॒नाम्। अस्त॑ऽतातिम्। चि॒त्। आ॒यवे॑ ॥६॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:7» मन्त्र:6 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:25» मन्त्र:1 | मण्डल:5» अनुवाक:1» मन्त्र:6


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर विद्वानों के विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (मर्त्यः) मनुष्य (आयवे) मनुष्य के लिये और (विश्वस्य) संसार के (धायसे) धारण के लिये (यम्) जिस (पुरुस्पृहम्) बहुतों से प्रशंसा करने योग्य (पितूनाम्) अन्नों के (स्वादनम्) स्वाद और (अस्ततातिम्) गृहस्थ को (चित्) भी (प्र, विदत्) प्राप्त होवे, उसको परोपकार के लिये धारण करे ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य को जिस उत्तम वस्तु और ज्ञान की प्राप्ति होवे, उस उसको सब के सुख के लिये धारण करे ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रस्वादनं पितूनाम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यम्) = जिस (पुरुस्पृहम्) = खूब ही स्पृहणीय [= चाहने योग्य] प्रभु की (मर्त्यः) = मनुष्य (विदत्) = जानता है। जब मनुष्य उस प्रभु को जानता है तो यही अनुभव करता है कि वे प्रभु (विश्वस्य धायसे) = सब के धारण के लिये होते हैं । अन्ततो गत्वा ये प्रभु ही हमारा धारण कर रहे हैं। साक्षात् देखने में तो पृथिवी माता व द्यौ पिता ही हमें वृष्टि द्वारा सब धनों को प्राप्त करा रहे हैं। परन्तु इनके अन्दर भी तो उस उस शक्ति को रखनेवाले वे प्रभु ही हैं। सो वस्तुतः, प्रभु ही सबका धारण करते हैं । [२] वे प्रभु ही सब (पितूनाम्) = अन्नों के (प्र स्वादनम्) = प्रकृष्ट स्वाद को करनेवाले हैं 'पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः' । तथा (आयवे) = गतिशील पुरुष के लिये (चित्) = निश्चय से (अस्तताति) = गृह का विस्तार करनेवाले वे प्रभु ही हैं। प्रभु ही घर व अन्न को देकर हमें उन्नति के लिये अवसर प्राप्त कराते हैं। इस प्रकार वस्तुतः प्रभु ही सबका धारण कर रहे हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही स्पृहणीय हैं। वे ही तो सब का धारण कर रहे हैं। धारण के लिये वे ही अन्न व घर को देते हैं।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्विद्वद्विषयमाह ॥

अन्वय:

मर्त्य आयवे विश्वस्य धायसे यं पुरुस्पृहं पितूनां स्वादनमस्ततातिं चित्प्र विदत्तं सर्वोपकाराय दध्यात् ॥६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यम्) (मर्त्यः) (पुरुस्पृहम्) बहुभिः स्पर्हणीयम् (विदत्) लभेत (विश्वस्य) जगतः (धायसे) धारणाय (प्र) (स्वादनम्) (पितूनाम्) अन्नानाम् (अस्ततातिम्) गृहस्थम् (चित्) (आयवे) मनुष्याय ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्येण यद्यदुत्तमं वस्तु ज्ञानं च लभ्येत तत्तत्सर्वेषां सुखाय दध्यात् ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the service of Agni, unaging sustainer of the world, let mortal man know and attain to Agni, favourite love of all, because Agni is supreme among the pleasures of life and Agni is the ultimate home of living beings, in fact, of everything in existence.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The duties of the enlightened persons are stated.

अन्वय:

A man should use his desirable knowledge or things for the good of all, because he gets it for the sake of a man and for upholding the world. What tasteful food he gets should be used for benefitting others, after acquiring necessary strength for himself. And a householder when he comes in contact, with such a person should also be persuaded to use his wealth and energy for doing good to others.

भावार्थभाषाः - A man should use whatever good things and knowledge he gets to acquire the happiness of all.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांना ज्या ज्या उत्तम वस्तू व ज्ञान प्राप्त होते ते सर्वांच्या सुखासाठी द्यावे. ॥ ६ ॥