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सं यदि॒षो वना॑महे॒ सं ह॒व्या मानु॑षाणाम्। उ॒त द्यु॒म्नस्य॒ शव॑स ऋ॒तस्य॑ र॒श्मिमा द॑दे ॥३॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

saṁ yad iṣo vanāmahe saṁ havyā mānuṣāṇām | uta dyumnasya śavasa ṛtasya raśmim ā dade ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम्। यत्। इ॒षः। वना॑महे। सम्। ह॒व्या। मानु॑षाणाम्। उ॒त। द्यु॒म्नस्य॑। शव॑सा। ऋ॒तस्य॑। र॒श्मिम्। आ। द॒दे॒ ॥३॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:7» मन्त्र:3 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:24» मन्त्र:3 | मण्डल:5» अनुवाक:1» मन्त्र:3


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब विद्वान् के विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (मानुषाणाम्) मनुष्यों के बीच (द्युम्नस्य) धन वा यश तथा (ऋतस्य) सत्य का (शवसा) सेना से (यत्) जैसे (हव्या) देने और लेने योग्य (इषः) अन्न आदि सामग्रियों का हम लोग (सम्, वनामहे) अच्छे प्रकार सेवन करें (उत) वा (रश्मिम्) प्रकाश को मैं (सम्, आ, ददे) ग्रहण करता हूँ, वैसे आप लोग भी करो ॥३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन पक्षपात को छोड़ के यथायोग्य व्यवहार कर मनुष्यों के आत्माओं में विद्याप्रकाश को धारण करें तो सब योग्य होते हैं ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्युम्न- शवस्-ऋत

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जब हम (इष:) = प्रभु प्रेरणाओं का (संवनामहे) = सम्यक् संभजन करते हैं, अर्थात् प्रभु प्रेरणाओं के अनुसार जीवन को बनाते हैं तथा (मानुषाणाम्) = विचारशील पुरुषों के (हव्या) = हव्य पदार्थों का ही (सम्) = [वनामहे ] संभजन [सेवन] करते हैं। तो (द्युम्नस्य) = ज्ञान-ज्योति की (रश्मिम्) = किरणों को आददे ग्रहण करता हूँ। (उत) = और (शवस:) = बल की रश्मि को ग्रहण करता हूँ । ज्ञान व बल को प्राप्त करके मैं (ऋतस्य) = ऋत की रश्मि को प्राप्त करता हूँ। मेरा जीवन तब ऋतमय बन जाता है, इसमें से सब अनृत दूर हो जाते हैं। [२] मनुष्य प्रभु प्रेरणा के अनुसार चले तथा सदा विचारशील बन करके अकेला खानेवाला न बन जाये, यज्ञ करके यज्ञशेष का ही सेवन करे। ऐसा करने पर 'ज्ञान, बल व ऋत' की प्राप्ति होती है। मस्तिष्क में ज्ञान, शरीर में बल तथा मन में ऋत। ज्ञान से मस्तिष्क दीप्त होता है, तो बल से शरीर स्वस्थ व नीरोग बनता है और ऋत से मन पवित्र बना रहता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु प्रेरणा को सुनें और यज्ञशेष का सेवन करें। यही ज्ञान, बल व ऋत को प्राप्त करने का मार्ग है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ विद्वद्विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! मानुषाणां द्युम्नस्यर्तस्य शवसा यद्धव्या इषो वयं सं वनामहे। उत रश्मिं समा ददे तथा यूयमपि कुरुत ॥३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सम्) (यत्) यथा (इषः) अन्नाद्याः सामग्रीः (वनामहे) सम्भजामः (सम्) (हव्या) दातुमादातुमर्हाः (मानुषाणाम्) मनुष्याणाम् (उत) (द्युम्नस्य) धनस्य यशसो वा (शवसा) (ऋतस्य) सत्यस्य (रश्मिम्) प्रकाशम् (आ) (ददे) ॥३॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यदि विद्वांसः पक्षपातं विहाय यथायोग्यं व्यवहारं कृत्वा मनुष्यात्मसु विद्याप्रकाशं सन्दध्युस्तर्हि सर्वे योग्या जायन्ते ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When we join together and pray for foods and energy forms, and the oblations of holy materials into the fire for the good of humanity rise in fragrance, then Agni with its power takes over the reins of rain showers and abundance of wealth and well being.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The duties of the enlightened persons are told.

अन्वय:

O men ! the way we take and properly utilize food grains and other presentable commodities which create and boost economic power or reputation and truth and take the support of light (of knowledge); in the same manner, you should also do.

भावार्थभाषाः - If enlightened persons generate the light of knowledge in the souls of men by dealing with them impartially, then they may become good and fit to receive words of wisdom
टिप्पणी: In the Divine prayer of AsatoMaa Sadgamaya, Tamaso Maa Jyotirgamaya, the Jyoti or light has been described and symbolized to knowledge. Hence the translated portion is relevant.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जे विद्वान भेदभाव न करता यथायोग्य व्यवहार करतात व माणसांच्या आत्म्यांमध्ये विद्या प्रकट करतात. त्यामुळे सर्वांमध्ये योग्यता निर्माण होते. ॥ ३ ॥