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इति॑ चिन्म॒न्युम॒ध्रिज॒स्त्वादा॑त॒मा प॒शुं द॑दे। आद॑ग्ने॒ अपृ॑ण॒तोऽत्रिः॑ सासह्या॒द्दस्यू॑नि॒षः सा॑सह्या॒न्नॄन् ॥१०॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

iti cin manyum adhrijas tvādātam ā paśuṁ dade | ād agne apṛṇato triḥ sāsahyād dasyūn iṣaḥ sāsahyān nṝn ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इति॑। चि॒त्। म॒न्युम्। अ॒ध्रिजः॑। त्वाऽदा॑तम्। आ। प॒शुम्। द॒दे॒। आत्। अ॒ग्ने॒। अ॑पृणतः। अत्रिः॑। स॒स॒ह्या॒त्। दस्यू॑न्। इ॒षः। स॒स॒ह्या॒त्। नॄन् ॥१०॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:7» मन्त्र:10 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:25» मन्त्र:5 | मण्डल:5» अनुवाक:1» मन्त्र:10


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अग्निशब्दार्थ राजविषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) विद्वन् ! (अध्रिजः) धारण करनेवालों में उत्पन्न आप (मन्युम्) क्रोध को (सासह्यात्) निरन्तर सहें (अत्रिः) निरन्तर पुरुषार्थी आप (अपृणतः) नहीं पालन करते हुए (दस्यून्) दुष्ट साहस करनेवाले चोरों को (सासह्यात्) निरन्तर सहें और (आत्) सब ओर से (इषः) इच्छाओं और (नॄन्) नीति से युक्त मनुष्यों को निरन्तर सहें (इति) इस प्रकार वर्त्तमान (चित्) भी (त्वादातम्) आपसे देने योग्य (पशुम्) पशु को मैं (आ, ददे) ग्रहण करता हूँ ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जो राजजन क्रोधादि और दुष्ट व्यसनों का निवारण करके चोर डाकुओं को जीत कर श्रेष्ठ पुरुषों से किये गये अपमान को सहें, वे अखण्डित राज्य युक्त होते हैं ॥१०॥ इस सूक्त में मित्रत्व, विद्वान्, राजा और अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सप्तम सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दस्यून्- सासह्यात्द

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इति चित्) = इस प्रकार गतमन्त्र में वर्णित सोम [सर्पि] के रक्षण के द्वारा, (अध्रिजा:) = [अधृष्यं जनयिता सा०] शत्रुओं से अधर्षणीय बल को अपने में पैदा करनेवाला यह व्यक्ति, हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (त्वादातम्) = आपसे दिये गये (मन्युम्) = ज्ञान को तथा (पशुम्) = सर्वद्रष्टा आपको (आददे) = ग्रहण करता है। सोमरक्षण से ज्ञान व प्रभु की प्राप्ति होती है। [२] (आत्) = अब, ज्ञान और प्रभु को प्राप्त करने के बाद, (अत्रिः) = यह काम-क्रोध-लोभ से ऊपर उठनेवाला व्यक्ति (अपृणत:) न पालन करनेवाली (दस्यून्) = दास्यव वृत्तियों को (सासह्यात्) = पराभूत करता है। इसके अन्दर आसुरी वृत्तियाँ प्रबल नहीं हो पातीं। यह (इषः) = प्रभु की प्रेरणा को सुननेवाला व्यक्ति (नॄन्) = आक्रमण करनेवाले शत्रुभूत व्यक्तियों को भी पराभूत करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का उपासक सोमरक्षण के द्वारा ज्ञान को व प्रभु को प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके दास्यव वृत्तियों को, तथा शत्रुभूत मनुष्यों को पराजित करता है। अगले सूक्त में भी यह 'इष आत्रेय' ही अग्नि का उपासन करता हुआ कहता है कि -

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाग्निशब्दार्थराजविषयमाह ॥

अन्वय:

हे अग्नेऽध्रिजो भवान् मन्युं सासह्यादत्रिस्त्वमपृणतो दस्यून् सासह्यादादिषो नॄँश्च सासह्यादिति वर्त्तमानाच्चित्त्वत्त्वादातं पशुमहमा ददे ॥१०॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इति) अनेन प्रकारेण (चित्) अपि (मन्युम्) क्रोधम् (अध्रिजः) अध्रिषु धारकेषु जातः (त्वादातम्) त्वया दातव्यम् (आ) (पशुम्) (ददे) ददामि (आत्) (अग्ने) विद्वन् (अपृणतः) अपालयतः (अत्रिः) सततं पुरुषार्थी (सासह्यात्) भृशं सहेत् (दस्यून्) दुष्टान् साहसिकान् चोरान् (इषः) इच्छाः (सासह्यात्) अत्रोभयत्राभ्यासदीर्घः। (नॄन्) नीतियुक्तान् मनुष्यान् ॥१०॥
भावार्थभाषाः - ये राजानः क्रोधादीन् दुर्व्यसनानि च निवार्य दस्यूञ्जित्वा श्रेष्ठैः कृतमपमानं सहेरँस्तेऽखण्डितराज्या भवन्तीति ॥१०॥ अत्र मित्रत्वविद्वद्राजाग्निगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति सप्तमं सूक्तं पञ्चविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This is the song of praise and prayer, O lord, Agni, giver of light, peace and power. Bom among the dedicated aspirants, I accept the gift of peace and passion, power and property and cattle wealth. Let man be Atri, free from threefold suffering of body, mind and soul. Let man challenge the ungenerous and fight out the impending dangers, human as well as natural, and hold on to noble men and aspirations.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The duties of a king described with the word Agni, are cited.

अन्वय:

O learned king ! shining like fire, you are born among the upholders of the people and overcome anger. Being ever industrious, you subdue wicked robbers and thieves, who are trouble-shooters and put-up with all desires and leading men. I accept an animal offered by you with love.

भावार्थभाषाः - Those kings become lords of the inviolable kingdom who having given up anger and vices, having crushed all robbers and thieves, who inflicted on the gentlemen.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे राजजन क्रोध व दुष्ट व्यसनांचे निवारण करून चोर व दस्यूंना जिंकून श्रेष्ठ पुरुषांकडून केलेला अपमान सहन करतात त्यांचे राज्य अखंडित असते. ॥ १० ॥