आ रु॑द्रास॒ इन्द्र॑वन्तः स॒जोष॑सो॒ हिर॑ण्यरथाः सुवि॒ताय॑ गन्तन। इ॒यं वो॑ अ॒स्मत्प्रति॑ हर्यते म॒तिस्तृ॒ष्णजे॒ न दि॒व उत्सा॑ उद॒न्यवे॑ ॥१॥
ā rudrāsa indravantaḥ sajoṣaso hiraṇyarathāḥ suvitāya gantana | iyaṁ vo asmat prati haryate matis tṛṣṇaje na diva utsā udanyave ||
आ। रु॒द्रा॒सः॒। इन्द्र॑ऽवन्तः। स॒ऽजोष॑सः। हिर॑ण्यऽरथाः। सु॒वि॒ताय॑। ग॒न्त॒न॒। इ॒यम्। वः॒। अ॒स्मत्। प्रति॑। ह॒र्य॒ते॒। म॒तिः। तृ॒ष्णऽजे॑। न। दि॒वः। उत्साः॑। उ॒द॒न्यवे॑ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब आठ ऋचावाले सत्तावन सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में रुद्रगुणों को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सुविताय गन्तन
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ रुद्रगुणानाह ॥
हे मनुष्या ! यथा हिरण्यरथा सजोषस इन्द्रवन्तो रुद्रासः सुवितायाऽऽगन्तन। येयमस्मन्मतिः सा वः प्रति हर्यते तृष्णज उदन्यव उत्सा न ये दिवः कामयन्ते तेऽस्माभिः सततं सत्कर्त्तव्याः ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of the Rudras are told.
O brave persons ! you cause the wicked to weep. Loving and serving one another equally, having gold in the chariots or with splendid cars, endowed with much wealth, you come hither for our welfare and prosperity. In fact our intellect longs for your company intensely like a thirsty man desires water from the well. You should be respected by us.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात रुद्र व वायूच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
