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उ॒त स्य वा॒ज्य॑रु॒षस्तु॑वि॒ष्वणि॑रि॒ह स्म॑ धायि दर्श॒तः। मा वो॒ यामे॑षु मरुतश्चि॒रं क॑र॒त्प्र तं रथे॑षु चोदत ॥७॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta sya vājy aruṣas tuviṣvaṇir iha sma dhāyi darśataḥ | mā vo yāmeṣu marutaś ciraṁ karat pra taṁ ratheṣu codata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त। स्यः। वा॒जी। अ॒रु॒षः। तु॒वि॒ऽस्वनिः॑। इ॒ह। स्म॒। धा॒यि॒। द॒र्श॒तः। मा। वः॒। यामे॑षु। म॒रु॒तः॒। चि॒रम्। क॒र॒त्। प्र। तम्। रथे॑षु। चो॒द॒त॒ ॥७॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:56» मन्त्र:7 | अष्टक:4» अध्याय:3» वर्ग:20» मन्त्र:2 | मण्डल:5» अनुवाक:4» मन्त्र:7


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मरुतः) मनुष्यो ! जो (वाजी) वेगवान् (इह) इस में (अरुषः) मर्मस्थल के (तुविष्वणिः) बल का सेवी (दर्शतः) देखने योग्य (धायि) धारण किया जाता है (स्यः) वह (यामेषु) यम आदि से युक्त उत्तम व्यवहारों वा प्रहरों में (वः) आप लोगों को (चिरम्) बहुत कालपर्य्यन्त (मा) मत (स्म) ही (करत्) करे अर्थात् न निषेध करे (तम्, उत) उसी को (रथेषु) रथों में (प्र, चोदत) प्रेरित करो ॥७॥
भावार्थभाषाः - जो अग्निविद्या को धारण करते हैं, उनका सब समय में सत्कार करो ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणसाधना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणो ! (उत) = और (स्यः) = वह (वाजी) = शक्तिशाली, (अरुषः) = आरोचमान, (तुविष्वणिः) = महान् स्तुति शब्दोंवाला, (दर्शत:) = दर्शनीय यह अन्तःकरण (इह) = यहाँ इस शरीर में (स्म) = निश्चय से (धायि) = धारण किया जाता है। प्राणसाधना से ही वस्तुत: मन 'शक्तिशाली, ज्ञानदीप्त व प्रभु स्तवनवाला' बनता है। [२] हे (मरुतः) = प्राणो ! यह मन (वः यामेषु) = तुम्हारी गतियों के होने पर (मा चिरं करत्) = बाहर विषयों में देर तक भटकता न रहे। यह शीघ्र ही विषय-व्यावृत्त होकर शरीर में निरुद्ध हो । (तम्) = उस मन को आप (रथेषु) = इन शरीर-रथों में ही (प्रचोदत) = प्रकर्षेण प्रेरित करो। ये भटके नहीं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से मन शरीर में ही निरुद्ध होकर 'शक्तिशाली, आरोचमान व खूब स्तुतिवाला' बनता है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मरुतो ! यो वाजी इहाऽरुषस्तुविष्वणिर्दर्शतो धायि स्यो यामेषु वश्चिरं मा स्म करत्तमुत रथेषु प्र चोदत प्रेरयत ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) (स्यः) सः (वाजी) वेगवान् (अरुषः) मर्मणः (तुविष्वणिः) बलसेवी (इह) अस्मिन् (स्म) (धायि) ध्रियते (दर्शतः) द्रष्टव्यः (मा) (वः) युष्मान् (यामेषु) यमादियुक्तशुभव्यवहारेषु प्रहरेषु वा (मरुतः) मानवाः (चिरम्) (करत्) कुर्यात् (प्र) (तम्) (रथेषु) (चोदत) ॥७॥
भावार्थभाषाः - येऽग्निविद्यां धरन्ति तान् सर्वदा सत्कुरुत ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And now, O Maruts, adventurers and explorers of the earth, that volatile, wondrous and vociferous energy of red flames is here used in the chariot. It would not delay you any more in your advancement. Ignite and accelerate it in the chariots.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject (of science of Agni. Ed.) is further described.

अन्वय:

O mighty persons ! this Agni-like very strong and speedy red horse, loudly neighing (and beautiful to be hold, has been placed here. Let him not delay you in your good dealings endowed with YAMAS and NIYAMAS of fixed periods (here two meanings of the word ч are given Ed.) Spur him forth in your vehicles.

भावार्थभाषाः - Always honour those persons who are well- versed in the science of Agni (fire and electricity).
टिप्पणी: पंच यमाः -- अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्या - परिग्रहाः यमाः । पंच नियमाः - शौचसंतोष तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः 5. Yamas—Non-violence. truthfulness, non-theft (Restraints), Brahmacharya (continence) non-attachment (non-covetousness Ed.). 5. Niyamas (observances). Cleanliness. contentment, austerity, study of the scriptures and surrender to God.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ज्यांना अग्निविद्या येते त्यांचा सदैव सत्कार करा. ॥ ७ ॥