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शर्धं॑शर्धं व एषां॒ व्रातं॑व्रातं ग॒णंग॑णं सुश॒स्तिभिः॑। अनु॑ क्रामेम धी॒तिभिः॑ ॥११॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śardhaṁ-śardhaṁ va eṣāṁ vrātaṁ-vrātaṁ gaṇaṁ-gaṇaṁ suśastibhiḥ | anu krāmema dhītibhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शर्ध॑म्ऽशर्धम्। वः॒। एषा॒॒म्। व्रात॑म्ऽव्रातम्। ग॒णम्ऽग॑णम्। सु॒श॒स्तिऽभिः। अनु॑। क्रा॒मे॒म॒। धी॒तिऽभिः॑ ॥११॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:53» मन्त्र:11 | अष्टक:4» अध्याय:3» वर्ग:13» मन्त्र:1 | मण्डल:5» अनुवाक:4» मन्त्र:11


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (धीतिभिः) जैसे अङ्गुलियों से कर्म्मों को वैसे (सुशस्तिभिः) अच्छी प्रशंसाओं से (वः) आप लोगों के और (एषाम्) इनके (शर्धशर्धम्) बल-बल और (व्रातंव्रातम्) वर्त्तमान-वर्त्तमान (गणंगणम्) समूह-समूह को (अनु, क्रामेम) उल्लङ्घन करें, वैसे आप लोगों को भी करना चाहिये ॥११॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य पूर्ण बल को करें तो बहुत बलिष्ठों का भी उत्क्रमण करें ॥११॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शर्ध-व्रात-गण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हम (एषाम्) = इन प्राणों के (शर्धं शर्धम्) = अंग-प्रत्यंग में होनेवाले उस उस बल को (अनुक्रामेम) = अनुक्रमेण प्राप्त हों। इन प्राणों के द्वारा हमारे सब अंग सबल हो। [२] हम इन प्राणों के (व्रातं व्रातम्) = प्रत्येक व्रतसमूह को (सुशस्तिभिः) = उत्तम शंसनों-स्तुतियों के साथ प्राप्त हों । प्रभु स्तवन करते हुए हम प्राणसाधना के द्वारा व्रतमय जीवनवाले हों। [३] (गणं गणम्) = प्रत्येक गण को [group] 'कर्मेन्द्रिय पञ्चक, ज्ञानेन्द्रिय पञ्चक, प्राण पञ्चक व अन्तःकरण पञ्चक' [मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, हृदय] आदि गणों को (धीतिभिः) = उत्तम कर्मों के द्वारा [अनुक्रामेम] अनुकूलता से प्राप्त करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना के द्वारा हमारा जीवन 'सबल, व्रती व उत्तम इन्द्रियादिगणोंवाला' हो ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यथा वयं धीतिभिः कर्माणीव सुशस्तिभिर्व एषाञ्च शर्धंशर्धं व्रातंव्रातं गणंगणमनु क्रामेम तथा युष्माभिरपि कर्त्तव्यम् ॥११॥

पदार्थान्वयभाषाः - (शर्धंशर्धम्) बलंबलम् (वः) युष्माकम् (एषाम्) (व्रातंव्रातम्) वर्त्तमानं वर्त्तमानम् (गणंगणम्) समूहंसमूहम् (सुशस्तिभिः) सुष्ठुप्रशंसाभिः (अनु) (क्रामेम) उल्लङ्घेम (धीतिभिः) अङ्गुलिभिः कर्माणीव ॥११॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । यदि मनुष्याः पूर्णं बलं कुर्युस्तर्हि बहून् बलिष्ठानप्युत्क्रामयेयुः ॥११॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let us move together step by step in disciplined order in accord with the united interests and aspirations of each unit of the defence forces, each unit of the economic order and each unit of the social order of these people for you all as a nation with the appraisal and appreciation of these with the best of our understanding and action.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Men's duties are pointed out.

अन्वय:

O men! we try to surpass in the strength, and the present position group of these heroes by our good praises because works are done by the help of the fingers. So you should also emulate.

भावार्थभाषाः - If men try to develop their power to the maximum, they can surpass even very powerful persons.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जर माणसांनी पूर्ण बल प्राप्त केले तर पुष्कळ बलवानाच्या पुढे जाता येते. ॥ ११ ॥