प्र श्या॑वाश्व धृष्णु॒यार्चा॑ म॒रुद्भि॒र्ऋक्व॑भिः। ये अ॑द्रो॒घम॑नुष्व॒धं श्रवो॒ मद॑न्ति य॒ज्ञियाः॑ ॥१॥
pra śyāvāśva dhṛṣṇuyārcā marudbhir ṛkvabhiḥ | ye adrogham anuṣvadhaṁ śravo madanti yajñiyāḥ ||
प्र। श्या॒व॒ऽअ॒श्व॒। धृ॒ष्णु॒ऽया। अर्च॑। म॒रुत्ऽभिः॑। ऋक्व॑ऽभिः। ये। अ॒द्रो॒घम्। अ॒नु॒ऽस्व॒धम्। श्रवः॑। मद॑न्ति। य॒ज्ञियाः॑ ॥ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब सत्रह ऋचावाले बावनवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य सत्कार करने योग्यों का सत्कार करें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्राणसाधना व शत्रुधर्षण
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्याः सत्कर्त्तव्यान् सत्कुर्युरित्याह ॥
हे श्यावाश्व ! ये यज्ञिया अद्रोघमनुश्वधं श्रवो मदन्ति तानृक्वभिर्मरुद्भिर्धृष्णुया प्रार्चा ॥ ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The worthy men should be honoured.
O man! who has a black flames of the fire (from the yajnas. Ed.) like horses, honour firmly those performers of the Yajnas, because they take delight in glory which is free from guile and accompanied with good food along with brave men. They are respected by the enlightened persons and do good deeds.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात वायू विश्वदेवाच्या गुणाचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
