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ऋत॑धीतय॒ आ ग॑त॒ सत्य॑धर्माणो अध्व॒रम्। अ॒ग्नेः पि॑बत जि॒ह्वया॑ ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ṛtadhītaya ā gata satyadharmāṇo adhvaram | agneḥ pibata jihvayā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऋत॑ऽधीतयः। आ। ग॒त॒। सत्य॑ऽधर्माणः। अ॒ध्व॒रम्। अ॒ग्नेः। पि॒ब॒त॒। जि॒ह्वया॑ ॥२॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:51» मन्त्र:2 | अष्टक:4» अध्याय:3» वर्ग:5» मन्त्र:2 | मण्डल:5» अनुवाक:4» मन्त्र:2


स्वामी दयानन्द सरस्वती

कैसे मनुष्यों को होना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (ऋतधीतयः) सत्य के धारण करनेवाले (सत्यधर्म्माणः) सत्य धर्म्म जिनका ऐसा विद्वानो ! आप लोग (अध्वरम्) अहिंसारूप व्यवहार को (आ, गत) प्राप्त हूजिये और (अग्नेः) अग्नि की (जिह्वया) जिह्वा से रस को (पिबत) पीजिये ॥२॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! आप लोग सत्यधर्म्म के धारण से अत्यन्त सुख को प्राप्त हूजिये ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ऋतधीतयः-सत्यधर्माणः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ऋतधीतयः) = ऋत की regularity [व्यवस्था] का धारण करनेवाले व (सत्यधर्माण:) = सत्य का पोषण करनेवाले तुम (अध्वरं आगत) = इस हिंसारहित यज्ञात्मक कर्म को प्राप्त होवो। हम अपने जीवनों में 'ऋत और सत्य' का पोषण करते हुए जीवन को यज्ञमय बनायें। [२] और जीवनयज्ञ में (अग्ने: जिह्वया) = अग्नि की जिह्वा से, अर्थात् उस अग्रणी प्रभु के नामों का उच्चारण करनेवाली जिह्वा से (पिबत) = सोम का पान करो। प्रभु का स्मरण करेंगे तो वासनाओं से आक्रान्त न होंगे। यह वासनाओं का अनाक्रमण हमें सोम का पान करने के योग्य बनायेगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ— ऋत व सत्य का धारण करते हुए हम जीवन को यज्ञमय बनायें। प्रभु का स्मरण करते हुए सोम का रक्षण करें।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

कीदृशैर्मनुष्यैर्भवितव्यमित्याह ॥

अन्वय:

हे ऋतधीतयः ! सत्यधर्म्माणो विद्वांसो यूयमध्वरमा गताग्नेर्जिह्वया रसं पिबत ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतधीतयः) ऋतस्य सत्यस्य धीतिर्धारणं येषान्ते (आ) (गत) आगच्छत (सत्यधर्म्माणः) सत्यो धर्म्मो येषान्ते (अध्वरम्) अहिंसामयं व्यवहारम् (अग्नेः) पावकस्य (पिबत) (जिह्वया) ॥२॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्या ! यूयं सत्यधर्म्मस्य धारणेनातुलं सुखं प्राप्नुत ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O divine scholars, radiations of nature’s vitalities, observers of the laws of universal truth, followers of the truth of Dharma and the Dharma of Truth, come to our yajna of love and non-violence and scientific creation in honour of the Lord. Agni, leading light of the world, drink the joy of life by the tongues of fire.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The ideal men are narrated.

अन्वय:

O upholders of truth! your Dharma is true. Come to this non-violent Yajna and drink the juice of devotion while speaking like an enlightened purifying leader.

भावार्थभाषाः - O men enjoy unmatched by upholding true Dharma.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो! तुम्ही सत्य धर्माचा स्वीकार करून अत्यंत सुख प्राप्त करा. ॥ २ ॥