स॒जूरा॑दि॒त्यैर्वसु॑भिः स॒जूरिन्द्रे॑ण वा॒युना॑। आ या॑ह्यग्ने अत्रि॒वत्सु॒ते र॑ण ॥१०॥
sajūr ādityair vasubhiḥ sajūr indreṇa vāyunā | ā yāhy agne atrivat sute raṇa ||
स॒ऽजूः। आ॒दि॒त्यैः। वसु॑ऽभिः। स॒ऽजूः। इन्द्रे॑ण। वा॒युना॑। आ। या॒हि॒। अ॒ग्ने॒। अ॒त्रि॒ऽवत्। सु॒ते। र॒ण॒ ॥१०॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'आदित्य वसु इन्द्र व वायु' बनना
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः स कीदृश इत्याह ॥
हे अग्ने विद्वन्नादित्यैर्वसुभिस्सह सजूर्वायुनेन्द्रेण सजूः सुतेऽत्रिवद् वर्त्तते तद्विज्ञापनायाऽऽयाहि रण च ॥१०॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How one becomes learned is told.
O learned person ! you purifier like the fire. United with the (months) with Vasus (earth, water etc.), and united with the mighty soul come to tell us about what is pervading in the world, and give us good teaching.
